केकड़े लड़ रहे हैं, पानी सूख रहा है हर कोई दोषी है, कोई दोषी नहीं।
भारत मानो एक अघोषित गृहयुद्ध में है। केकड़ों वाली पुरानी कहावत अब छोटी पड़ गई है। उस प्रवृत्ति से आगे निकल गए हैं जहाँ केकड़े एक-दूसरे को नीचे खींचते थे। लेकिन अब वे एक-दूसरे की आँखें नोच रहे हैं। देश का लगभग हर तंत्र अपने ही भीतर लड़ रहा है। पत्रकार यूट्यूबरों से लड़ रहे हैं। यूट्यूबर पत्रकारों से लड़ रहे हैं। इन्फ्लुएंसर विशेषज्ञों पर हमला कर रहे हैं। टीवी डिजिटल माध्यमों को कोस रहा है। पुरानी प्रतिष्ठा नई प्रतिष्ठा से भिड़ रही है। अर्थशास्त्री उद्योगपतियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। उद्योगपति अर्थशास्त्रियों को नाकाम बता रहे हैं।...