सत्तर साल जिया, मगर जाना क्या?
अपनी सत्तर वर्ष की उम्र में बुजुर्गों के जिए हुए जीवन और उनकी स्मृतियों में मैंने अपना बचपन तलाशा तो अपने ही समय को लेकर कई सवाल उठे। पचास वर्षों की पत्रकारिता में जिस भारत को देखा, जाना, समझा और लिखा, क्या वह इन लोगों के जिए हुए भारत से अलग था? या एक ही देश और समय को हम अपनी-अपनी दुनिया से अलग-अलग देखते रहे? लंबा जीना और जीवन को बड़ा जीना क्या एक ही बात है? और अब, जब मशीनें भी सोचने-लिखने लगी हैं, तब अपने जिए हुए जीवन, अपनी स्मृतियों और अनुभवों का अर्थ क्या रह जाता...