इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

अपना मानना है कि इंदिरा गांधी का इमरजेंसी ( emergency Indira gandhi ) लगाना और चुनाव का फैसला उनका खुद का निर्णय था। वे अंतर्मन से गाइडेड थीं। वे पार्टी में विद्रोह (चंद्रशेखर-धारिया की बेबाकी, जगजीवन राम-वाईबी चव्हाण आदि की महत्वाकांक्षाओं) के भय और विदेशी साजिश के डर के पैरानॉयड में थी। जिन्हें 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा भारत की 85 साल पुरानी पार्टी को तोड़ने का इतिहास ज्ञात है वे जानते हैं कि इंदिरा गांधी ने राजनीति को कैसी मनोदशा में खेला। मैं 1975-76 में पत्रकार नहीं था लेकिन जेएनयू में फ्रीलांसिग करने लगा था। ऐसा जेएनयू में होने के कारण नहीं था, बल्कि भीलवाड़ा में ‘नई दुनिया’ सहित उपलब्ध पत्र-पत्रिकाओं, ‘बीबीसी’ से बनी राजनीतिक चेतना से था। उस वक्त कच्चे दिमाग में जो दिलचस्पी बनी, उसके फ्लैशबैक में जब मैं मार्च 1971 से जून 1975 के चार सालों की घटनाओं पर सोचता हूं तो एक पहेली बनती है। सोचें, कांग्रेस के दो फाड़ के बाद इंदिरा गांधी ने अपने बूते लोकसभा की 352 सीटें जीती थीं। मार्च 1971 के चुनाव में विरोधी कामराज-मोरारजी कांग्रेस को सिर्फ 16 सीटें मिली थीं। तब नंबर दो पार्टी सीपीएम (25) थी और नंबर तीन पर जनसंघ (22 सीटें)। समाजवादियों की संसोपा-प्रसोपा के… Continue reading इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी की घोषणा के साथ पहले से बनाई लिस्ट अनुसार रात में सोते हुए जितने नेताओं-कार्यकर्तार्ओं को गिरफ्तार किया गया था वहीं इमरजेंसी बंदियों का असली लब्बोलुआब है। घोषणा के अगले दिन सूरज निकला तो तब गिरफ्तार हुए अपने केसी की जुबानी का सत्य कि दिल्ली की सड़कों पर, जेपी के पटना में इमरजेंसी के खिलाफ कुत्ता भी भौंकता हुआ नहीं था! indira gandhi in 1975 अनुभव में इमरजेंसी दिखती नहीं थी। विपक्ष को सांप सूंघा हुआ था। न प्रदर्शन थे और न आंदोलन। सन् 1975-76 में देश की आबादी कोई 70 करोड़ थी। लेकिन इमरजेंसी के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए लोगों की संख्या थी सात हजार। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बीस महीने में एक लाख 40 हजार लोगों की गिरफ्तारी का अनुमान लगाया था। और पता है इनमें सर्वाधिक कौन थे? 40 हजार सिख थे। इनके बाद आनंदमार्गी, नक्सलियों-मार्क्सवादियों की संख्या थी। हां, सबसे बड़ी संख्या अकाल तख्त की तानाशाही के खिलाफ आवाज के चलते थी। अकालियों ने सर्वाधिक गिरफ्तारियां दी। ऐसा किसी हिंदू संगठन या आरएसएस से जेल भरने का आव्हान नहीं था। इमरजेंसी का मर्दानगी से विरोध पंजाब में सिखों का और केरल में सीपीएम के काडर का था, जबकि दिल्ली से लेकर बिहार के हिंदी भाषी… Continue reading इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

जेएनयू और दिल्ली घूमते-देखते हुए लगा ही नहीं कुछ असामान्य है। जन-जीवन, आवाजाही और अखबार सब सामान्य। हां, अखबारों में विपक्ष और राजनीति की खबर ढूंढे नहीं मिलती थीं और न इमरजेंसी की खबर। मानों भारत बिना विपक्ष और राजनीति के हो। जेएनयू में बंदिश, घुटन जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। न ही सहपाठी छात्र-प्रोफेसर-स्टाफ उद्वेलित या बेचैन।…. जेएनयू की उन दिनों की याद से अब समझ आता है कि 26 जून 1975 से लेकर 10 जुलाई 1975 के पंद्रह दिनों में जो होना था वह हो गया। hari shankar vyas jindageenama : छब्बीस जून 1975 का वह दिन…मैं तब भीलवाड़ा में था। जेएनयू में दाखिले की तैयारी करता हुआ। जुलाई में दिल्ली आया और अपने जिले के एमफिल छात्रों रविंद्र व्यास, नंदलाल गुर्जर और राजस्थान से ही आए प्रो. कुरैशी की मदद व पिछड़े इलाके जैसी कसौटी से दाखिला हुआ। गंगा हॉस्टल में कमरा नंबर 317 रहने का ठिकाना। तीसरे फ्लोर पर सामने सीताराम येचुरी का कमरा था।…तब नए-पुराने दोनों कैंपस मुर्दनगी में शांत से लगे। उन दिनों भीड़ वैसे भी नहीं थी और मेरे जैसे, छोटे शहर के छोटे कॉलेज से आए छात्र के लिए भव्य, मगर खाली-खाली इमारतों में सामान्य हलचल हैरान करने वाली थी। आबोहवा में… Continue reading इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

ख्याल कौंधा है कि महामारी काल में जो ठहराव है वैसा अपने अनुभव में पहले कब था? दूसरा सवाल है कि ठहरे वक्त की किंकर्तव्यविमूढ़ता में पुरानी घटनाओं को फ्लैशबैक में टटोलें तो क्या निकलेगा? … आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ छह-सात क्षण हैं, घटनाएं हैं जो 75 साल का कुल अनुभव हैं। कौन सी हैं ये घटनाएं? एक, चीन से हार। दो, बांग्लादेश जीत। तीन, इमरजेंसी। चार, ब्लूस्टार ऑपरेशन। पांच, नरसिंह राव की अर्थ क्रांति। छह, अयोध्या में मस्जिद ध्वंस। सात, मंडल आयोग। आठ, कोविड-19 महामारी। पंडित का जिंदगीनामा: लंदनः समझदारी की पाठशाला पंडित का जिंदगीनामा-18:  ( hari shankar vyas ) महामारी काल….. अनिश्चित जिंदगी और उसे छोटा बनाता समय! तभी मुझे जीवन के उत्तरार्ध में वक्त को यादों में गुनगुनाते हुए होना चाहिए। जिंदगीनामा लिखते जाना चाहिए। लेकिन मैं भटका हूं! मान नहीं रहा हूं कि अखबारी सुर्खियों के खटराग में कुछ नहीं है। हिंदुओं का कलियुग कभी खत्म नहीं होगा। हमारे जीवन में देवत्व, आजादी, निर्भीकता, सत्यता और वह सभ्यता, वह सतयुग खिल ही नहीं सकता जो पशुता-एनिमल फार्म से दीगर पृथ्वी के कई मानवों का विकास है। यही सोचते हुए दिमाग फिर जिंदगी पर लिखने को कुलबुला रहा है। क्यों नहीं कुछ दिन दिमाग में… Continue reading फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

कभी कोशिश नहीं तो अब कैसे?

hindoo-buddhi-ka-kaayaakalp : भारत कलियुगी-  कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प? : जरा ज्ञात इतिहास के पन्ने पलटें। ढूंढें कब हिंदुओं में अपने को बदलने की जिद्द बनी? क्या कभी कलियुग मिटाने का धर्म संकल्प हुआ? क्या जाति-वर्ण-वर्ग-असमानता मिटाने का सामाजिक आंदोलन हुआ? गरीबी मिटाने का कोई राजनीतिक भूचाल आया? स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा बनवाने के लिए कभी हुक्मरानों के खिलाफ विद्रोह हुआ? क्या इस सबकी जरूरत नहीं थी, क्या आज नहीं है?…..इन सवालों के बीच का सत्य हिंदुओं का यह मानना है कि हमारे बस में नहीं बल्कि कलियुग मिटाने के लिए ईश्वर का अवतार होगा।….तभी ज्ञात इतिहास में कोई महानायक नहीं है जिससे उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सर्वत्र परिवर्तन का भभका बना हो। इस प्रसंग में बुद्ध और आदि शंकराचार्य फिट नहीं हैं। पूरे इतिहास में हमें न परिवर्तनकारी नेतृत्व मिला है, न स्वयंस्फूर्त रेनासां-पुनर्जगारण की भूख बनी और न विद्रोह का जज्बा। ऐसा हिंदू शरीर की कलियुगी आत्म-केंद्रित धारणाओं से है। सेल्फ-सेंटर्ड जीवन दृष्टि और मान्यताओं ने मौका बनने ही नहीं दिया जो परिवर्तन का हुंकारा बने, सुधारों की आंधी आए। उलटे, जिनसे उम्मीद थी वे भी लोक मान्यताओं के बंधक हुए। यह भी पढ़ें: पहले पाए इस जैविक रचना से मुक्ति बतौर मिसाल गांधी की लीडरशीप पर गौर करें।… Continue reading कभी कोशिश नहीं तो अब कैसे?

अधर्म जानें, अफीम छोड़ें!

bhaarat kaliyugee 23 : अधर्म जानें, अफीम छोड़ें! जरूरी है धर्म के कलियुगी अधर्म की अफीम से मुक्त होना।.. धर्म अपना पुराना है लेकिन धार्मिकता-आध्यात्मिकता-कर्मकांड कलियुगी हैं और उसमें जीवन शरीर का, जगत का, पृथ्वी का विशेष मोल नहीं हैं। मैं यह बात बार-बार लगातार रिपीट करता हूं तो इसलिए कि कलियुगी धार्मिकता में थोक भाव पृथ्वी को मृत्युलोक बनाने का अंधविश्वास बना है। वही बुद्धि, दिमाग और शरीर की चिरनिद्रा और सभ्यता के हाइबरनेशन में जाने का जड़ कारण है। bhaarat kaliyugee 23 : अपने पंडितजी पूजा के बाद आह्वान करते हैं धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो! पर धर्म कलियुगी या सतयुगी? यदि हम हिंदुओं में मान्यता है कि आज का वक्त कलियुगी, अंधकारपूर्ण और झूठ का है तो कलियुगी आचरण का धर्म-कर्म क्या अधर्म नहीं है? क्या झूठ और अंधविश्वासों में जीना अधर्म नहीं? तब उसका नाश होना चाहिए या नहीं? जय तब सत्य जीवन के सतयुगी-सनातन धर्म की है! तभी पहले निर्णय हो कि धर्म कौन सा सही है? गुलामी काल का आस्था-भक्ति-दासता-दीनता का धर्म सही या स्वतंत्र जीते भरतवंशियों के चिंतन-मनन-खोज के सत्य से निकला सतयुगी धर्म सही? निश्चित ही सतयुग के धर्म-आचरण और कलियुग के धर्म-आचरण में फर्क है। तो किसकी जय… Continue reading अधर्म जानें, अफीम छोड़ें!

पहले पाए इस जैविक रचना से मुक्ति

कैसे हो हिंदू बुद्धी का कायाकल्प आज का धर्म भरतवंशियों का  सनातनी धर्म नहीं है, बल्कि झूठ, गुलामी और भयाकुलता का अधर्म है। यह हमारे-आपके शरीर की सच्चाईयों, भौतिक आवश्यकताओं और मनुष्यगत स्वतंत्रता, आजादी की जरूरत में वह कुछ भी लिए हुए नहीं है जो सनातन काल में व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन चिंता में था। कैसे हो हिंदू बुद्धी का कायाकल्प?: कोई पूछे कि क्यों ऐसा है कि हमारी हस्ती मिटती नहीं तो बनती भी नहीं? अपना मानना है कलियुग ने दिमाग को झूठ, दिल को भय व शरीर को कुंभकर्णी नींद में ऐसा गुंथा है कि बतौर सभ्यता हम चिरनिद्रा, हाइबरनेशन में हैं। इसे समझ कर इससे मुक्ति पाएंगे तो बदलने का रास्ता बनेगा। अपने दिमाग का झूठ में जीना कलियुगी धर्म के कारण है। दिल की भयाकुलता गुलामी के अनंत अनुभवों से है और शरीर का सोया हुआ होना मानसिक विकार-विकलांगता से है। तीनों अंग एक-दूसरे से जुड़े हैं और सदियों के अनुभव के डीएनए में पके हैं। कलियुगी शाप में यह विचारना बेमतलब है कि पिछले तीन हजार सालों में किस वक्त कौन सा अंग अपंगता का शिकार हुआ। मोटे तौर पर यही चिंतन सटीक है कि सतयुग से कलियुग का संक्रमण काल सनातनी हिंदू जीवन… Continue reading पहले पाए इस जैविक रचना से मुक्ति

कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प?

कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प: दिमागी फितूर में ही मैं सत्य की संभावना न होते हुए भी विचार कर रहा हूं कि हिंदू सभ्यता कैसे सत्यगामी बने, कैसे अपने मूल सतयुगी आचरण में ढले? नोट करके रखें, जान ले दांव पर आने वाली पीढ़ियों व भारत राष्ट्र-राज्य का जीवन-मरण है। हां, यदि 140 करोड़ लोगों ने सत्य से जीने की जिद्द नहीं बनाई तो भारत का भविष्य भयावह बरबादी वाला है। वह सौ साल पहले के कबीलाई अंधकार में जीने वाले अफ्रीकी महाद्वीप से गया गुजरा होगा। भारत कलियुगी- 20: झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व! कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प: भारत कलियुगी- 21: सत्य जानें, समझें और बोलें! क्यों? इसलिए कि मनुष्य की विकास यात्रा अचेतन से चेतन, अंधकार से उजाले, भय से निर्भय, परतंत्र से स्वतंत्र, अज्ञान से ज्ञान, अंधविश्वास से विज्ञान आदि सभी के सत्य की उत्तरोत्तर बढ़ोतरी से है। सत्य से ही जीव जगत में इंसान अलग हुआ जानवर से। उससे भविष्य बना। सत्य शोध से निकले ज्ञान-विज्ञान ने ही मानव को मंगल ग्रह में बस्ती बसाने के मुकाम पर पहुंचाया है। और ध्यान रहे हम हिंदू सत्य के शुरुआती यज्ञकर्ता हैं। सोचें, सत्य-तथ्य और सतयुग की हमारी धारणा का क्या आधार है? यहीं न कि… Continue reading कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प?

झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व!

झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व! : झूठ से ही व्यक्तित्व जर्जर व खंडहर हुआ है। इसी से सत्य, पुरुषार्थ, हिम्मत सब खत्म और धीरे-धीरे होइहे सोइ जो राम रचि राखा का जीवन दर्शन बन गया। गुलामी, अंधकार, दीनता में जीते हैं लेकिन सर्वश्रेष्ठ, सर्वगुरू होने की खामोख्याली पाल कर दिमाग को सत्य-यथार्थ विमुख, पाखंडी और हिपोक्रेट बना डाला है। बातों के धनी, बातों के शेर व सच्चाई और अनुभव दोनों को बातों में उड़ा देना और मर-मर कर जीते हुए भी दीर्घायु होने की बात की जितनी लफ्फाजी भारत में हुई है शायद ही किसी और सभ्यता में हुई हो। भारत कलियुगी- 19: मृत्युलोक में मर मर कर जीना! झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व! | भारत कलियुगी- 20: प्रमाण सामयिक है तो उसी पर गौर करें! सोचें, 140 करोड़ लोगों और भारत राष्ट्र-राज्य का कोविड-19 की महामारी से जब पाला पड़ा तो कैसे उसका सामना हुआ? क्या हमने रियलिटी, सच्चाई और इतिहास के अनुभव में व्यवहार किया? खोपड़ी में क्या संकट की गंभीरता, वास्तविकता रजिस्टर हुई? क्या हमारा सत्यवादी व्यवहार था? बतौर नागरिक, बतौर व्यवस्था, बतौर लीडर क्या हमने झूठ, मूर्खतापूर्ण व्यवहार में अपने आपको धोखा नहीं दिया? क्या आचरण व रीति-नीति में बुद्धि की जगह मूर्खताएं नहीं थीं? अंधविश्वासों, लापरवाही, भाग्य-नियति… Continue reading झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व!

मृत्युलोक में मर मर कर जीना!

मृत्युलोक में मर मर कर जीना! : लाखों-करोड़ों लोग बीमारी में मरे या दिल्ली में नादिरशाह की तलवार से, मध्यकाल हो या आधुनिक काल, हिंदू की कलियुगि बुद्धि से ‘उफ’ भी नहीं निकलेगा। भले संविधान-संसद बना ली हो लेकिन यह सवाल-जवाब तब भी नहीं कि गंगा के शववाहिनी बनने के लिए कौन जिम्मेवार? इतनी मौतों, गुमनाम मौतों, लोगों के हजारों किलोमीटर पैदल चलने से ले कर ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाते मरीजों की मौत जैसी त्रासदियों के लिए कौन जिम्मेवार? भारत कलियुगी- 18: भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि! भारत कलियुगी- 19: मृत्युलोक में मर मर कर जीना! जरा उन लोगों को याद करें जो सन् 2020-21 की महामारी में लावारिस और लाचार थे। याद करें भारत के उन लाखों लोगों को जो भयाकुल सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। याद करें उन परिवारों को, जिनके सदस्य संक्रमित हुए तो समझ नहीं आया करें तो क्या करें और मौत हुई तो लाश गंगा में बहा दी। यों दूसरी सभ्यताओं का भी महामारी अनुभव है मगर भारत में करोड़ों लोगों की त्रासदी के अनुभव क्या अलग नहीं? यह जो अलग फील, हकीकत है वह अपने कलियुगी वक्त का स्थायी मामला है। हम हैं ही ऐसे कि जीना भी भय, चिंता, असुरक्षा, अनिश्चितता और भगवान भरोसे है… Continue reading मृत्युलोक में मर मर कर जीना!

भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव भटकी बुद्धि : पृथ्वी क्या, मृत्युलोक। संसार क्या, सांसारिकता का झमेला। अच्छा क्या, गुजरा वक्त अपना अतीत! कर्मफल क्या, भाग्य में लिखा हुआ! विश्वास, रास्ता और विकल्प क्या, भगवानजी के शरण और जैसे रामजी रखेंगे। जीवन का लक्ष्य क्या, मृत्युलोक के दुखों से मुक्ति! कर्म किसलिए, अगले जन्म के लिए!… ऐसा स्वभाव, यह अध्यात्म सदियों की गुलामी में दिल-दिमाग, बुद्धि का कलियुगी रूपांतरण है। भारत कलियुगी-17: बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा! भारत कलियुगी- 18: लाख टके का सवाल है इक्कीसवीं सदी में हिंदू कैसे जीवन जीता है? मतलब आर्ट ऑफ लिविंग, आर्ट ऑफ बीइंग, आर्ट ऑफ डूइंग याकि जीने की कला, स्वभाव और कर्म क्या? सवाल बड़े हैं और हिसाब से इस पर वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि पिछले तीन हजार सालों के अनुभव में विचारना चाहिए। इसलिए कि हम जैसे आज जी रहे हैं वैसे तीन हजार सालों से लगातार जीते हुए हैं। ऐसा भरतवंशियों की बनाई जीने की पद्धति, तरीके मतलब सतुयगी स्वभाव-अध्यात्म के भटकावों से है। अपना जीना कुछ विश्वासों-मान्यताओं पर जीने की प्रक्रिया और तरीका है। भरतवंशियों के दिल-दिमाग-बुद्धि का जो स्वभाव बना और वह जिन मान्यताओं-विश्वासरूपी अध्यात्म में ढला था तो उसी से आत्मा-परमात्मा, ब्रह्मज्ञान, कर्मकांड, निर्वाण के जितने दीये बने… Continue reading भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

कलियुगी दिमाग सोचता हुआ नहीं है। वह ठहरा हुआ, जड़, कुंद, मंद की उस मानसिक विकलांगता में है, जिसमें न चेतना है, न बोध-समझ के तंतु हैं और न जिज्ञासा। पूरी तरह अवैज्ञानिक चित्त, कूपमंडूक वृत्तियां और गैर-साइंटिफिक दिमाग।.. दरअसल सभ्यता का अपना सफर और इतिहास भ्रम और भटकने की कई गांठे लिए हुए है। उनसे बुद्धि बंधी हुई है, जिन्हें सुलझाने, खत्म करने का किसी भी वक्त में, किसी भी युगपुरूष के हाथों प्रयास नहीं हुआ। तभी बुद्धि कैंसर वंशानुगत ट्रांसफर होता गया। भारत कलियुगी-16: कलियुगी बीमारी और लक्षण भारत कलियुगी-17: कलियुगी हिंदू शरीर की अबूझ कैंसर गांठ बुद्धि है। दरअसल हिंदू का जीवन सफर विचित्र व उलटा रहा है! बचपन में बुढ़ापे वाले काम और जवानी में बुढ़ापा व भक्ति और गुलामी! मैं विस्तार से पहले लिख चुका हूं कि सभ्यताओं के पालने में सप्तसिंधु के भरतवंशियों की चेतना-बुद्धि गजब दौड़ी थी। उन्होंने वेद रचे। प्रकृति को साधा। सनातन जीवन पद्धति का ध्यान, चिंतन-मनन किया। स्मृति-श्रुति परंपरा में जीवन तत्वों का ज्ञान-विज्ञान-सत्य शोध किया तो वहीं नगर विकास भी सोचा। चार-पांच हजार साल पहले के उस बाल काल में गणित, विज्ञान, दर्शन, पतजंलि, चार्वाक, बुद्ध आदि की तमाम धाराएं थी। वह समझ भारत का अपूर्व बौद्धिक बल था।… Continue reading बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

कलियुगी बीमारी और लक्षण

हम ओलंपिक-नोबेल-ज्ञान-विज्ञान-सत्य की वास्तविकता में गरीब, दरिद्र होने का कलियुगी जीवन लिए हुए हैं तो यह सच श्रीमद्भागवत से चला आ रहा है।…बाकी सभ्यताओं में शरीर ऐसा नहीं क्योंकि कलियुगी कैंसर के मारे सिर्फ हम हैं। बाकी सभ्यताओं ने पृथ्वी और जीवन को यदि कर्मलोक, जिंदगी के भोग का मौका माना है जबकि हिंदू दिमाग, उसका चित्त यदि पृथ्वी को मृत्युलोक व  संसार निसार की मान्यता में जीता हुहै तो हिंदू का शरीर न तो किंगकांग होगा और न दिमाग से अल्बर्ट आइंस्टीन! भारत कलियुगी-15: लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन! भारत कलियुगी-16:  आखिर कैसे बना हिंदू जीवन का अंधकार काल?  इस पर विचार से पहले जानना चाहिए कि हिंदू धर्मग्रंथों ने हमारे कलियुगी जीवन के क्या लक्षण बताए हैं? जवाब श्रीमदभागवत गीता से लेकर रामचरितमानस आदि ग्रंथों के श्लोक, चौपाई, दोहों में है। इन्हीं के आधार पर मैं हिंदू कलियुगी जीवन के डायग्नोसिस को तीन हिस्सों में बाटंता हूं- हिंदू शरीर-जीवन, हिंदू समाज-धर्म और हिंदू देश-व्यवस्था-राजनीति। इन तीनों अंगों में जीवन जीने के तरीके, दशा-दिशा के सार में ये प्रतिनिधि दस लक्षण गागर में सागर हैं- शरीर-जीवनः1- शारीरिक बल व याद्दाश्त और सत्य में दिनों दिन गिरावट (श्रीमद्भागवत,12.2.1)। 2- लोग छोटी-घटिया दृष्टि-बुद्धि वाले, अभागे, पेटू, कामी व दरिद्र होंगे (श्रीमद्भागवत,12.2.31)| धर्म-समाजः… Continue reading कलियुगी बीमारी और लक्षण

लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

तभी सदियों से चेतना का अपना ज्वालामुखी सोया हुआ, सुषुप्त है। असंख्य हमलावरों, तरह-तरह के अत्याचारों-गुलामी और सत्ता-हाकिमों की ज्यादतियों के बावजूद हिंदू चेतना का लावा कभी फटता नहीं। न बगावत, न कोई विद्रोह, न क्रांति-प्रतिक्रांति मतलब पूरी तरह अपना मृत्युलोक वह पाताल बनाए हुए है, जो हिमखंड में रचा-पका है। ऐसा बर्फीला, बेहोश दिमाग क्या तो रियलिटी बूझेगा, क्या सत्य स्वीकारेगा और क्या अपने और अपने देश को सुधारेगा। न व्यक्ति सुधर सकता है और न बाड़ा। भारत कलियुगी-14: जान लें, जीना नहीं हमारा जीना! भारत कलियुगी-15:  जैसे गुजरी सदियों में समझ नहीं थी वैसे इक्कीसवीं सदी में भी कलियुगी हिंदुओं को बोध नहीं है कि हमारा जो जीना है वह मर-मर कर जीना है। वह अपने ही बनाए मृत्युलोक का नारकीय जीवन है! कुछ लाख एलिट-शासक-हाकिम भले अलग जिंदगी जीते हों अन्यथा बतौर मनुष्य 140 करोड़ भारतीय बिना मानवीय गरिमा से जीते हुए हैं। भारत का वर्तमान, खासकर महामारी काल वह वक्त लिए हुए है, जो मानव सभ्यता के आधुनिक इतिहास में बतौर कलंक दर्ज रहेगा। एक ओर आधुनिक इक्कीसवीं सदी में पृथ्वी का इंसान अंतरिक्ष यात्रा करता हुआ तो दूसरी तरफ भारत के अमिट फोटो….शववाहिनी गंगा..गर्मी में लाखों-करोड़ों लोगों का तपती सड़कों पर पैदल घर जाना….कंक्रीट के… Continue reading लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

बाकी सभ्यताओं और कलियुगी हिंदू सभ्यता का यह कैसा विकट अंतर है जो हम 140 करोड़ लोग और भारत देश मृत्युलोक में मर-मर के जीवन जीने का ख्याल लिए हुए हैं, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि सभ्य विकसित देश और उनके लोग पृथ्वी की कर्मलौकिकता में जीवन बनाते, जीवन भोगते हुए ब्रह्माण्ड के परलोक में अपनी कॉलोनी बसाने की जीवंतता से जी रहे हैं। वे महामारी काल में भी अपने लोगों को अंतरिक्ष की यात्रा कराने स्पेस यान की टेस्टिंग करवाते हुए हैं। कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर! भारत कलियुगी-14: इक्कीसवीं सदी का सत्य है मनुष्य की देवलोक जैसी उपलब्धियां। इस बात को हम हिंदू न मान सकते हैं और न समझ सकते हैं। तब भी कल्पना करें कि इक्कीसवीं सदी में पश्चिम के लोग क्या कुछ करते हुए हैं? जवाब है मंगल पर बस्ती बसाने, लोगों को अंतरिक्ष में घूमाने, कृत्रिम मेधा या एआई से मनुष्य जीवन स्वचालित बनाने और रोबो बना कर मनुष्य को श्रम से पूरी तरह मुक्त बना देने के प्रोजेक्ट हैं। ये ऐसे प्रकल्प हैं कि परलोक में यदि कहीं ईश्वर है तो वह मानव प्रतिभा-विकास से जलन करेगा। जानने वाली बात है कि सभ्य-विकसित देशों में मनुष्य देवलोक की कल्पनाओं को साकार बनाता हुआ है।… Continue reading जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

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