कबीरदास खुद कहते हैं ‘मेरी बोली पूरबी’
कबीर की मुख्य भाषा साधुक्कड़ी थी, जिसमें भोजपुरी, अवधी, ब्रज और राजस्थानी के शब्द मिलते हैं। लेकिन उनकी रचनाओं (विशेष रूप से भजनों और साखियों) में भोजपुरी की बोली, लय और शब्दावली का गहरा प्रभाव है। भोजपुरी अंचल में 'निर्गुण' कबीर की विचारधारा को जन जन तक पहुंचाने का सबसे लोकप्रिय माध्यम है। 'तोरी गठरी में लागे चोर', 'कवने ठगवा नगरिया लूटल हो', और 'भंवरवा के तोहरा संग जाई' जैसे उनके कई भजन भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य धरोहर हैं। कबीरदास जयंती- 29 जून संत कबीरदास जी ने स्वयं अपनी भाषा के बारे में लिखा है, ‘मेरी बोली पूरबी, हमें...