भाषा बदली नहीं कि राजनीति बेचैन!
कहा जाता है, भाषा ही मनुष्य की पहचान होती है। शायद यही बात किसी पीढ़ी पर भी लागू होती है। हर दौर अपनी भाषा गढ़ता है और वही भाषा उसके सोचने, बोलने और विरोध करने का तरीका तय करती है। पिछले सप्ताह देशभर में फैले छात्र आंदोलनों ने एक अप्रत्याशित बहस छेड़ दी। बहस इस पर नहीं हुई कि छात्रों को आखिर सड़कों पर उतरना क्यों पड़ा। न ही इस पर कि उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ। देश की सबसे बड़ी चिंता उनकी भाषा बन गई—उनके मीम, उनका स्लैंग, उनका बेपरवाह अंदाज़ और वह लहजा, जो उन राजनीतिक आंदोलनों से...