हरियाणा की ये महा-पंचायतें

नूह और पटौदी दोनों ही जगह पुलिस ने इन भाषणों पर कोई कार्रवाई नहीं की। तो आखिर ऐसे आयोजनों का मकसद क्या है? क्या सत्ताधारी दल को शांति से एलर्जी है या वह मानती है कि ऐसे भड़काऊ माहौल ही उसकी सत्ता का आधार हैं? क्या वह इसके संभावित भयानक नतीजों से नावाकिफ है? Haryana nuh pataudi mahapanchayats : देश में अब हिंदुत्व की पैरोकार पार्टी की एक तरह के ऐसी सत्ता है, जिसे फिलहाल कोई चुनौती नहीं है। बहुत से दूसरे राज्यों की तरह हरियाणा में भी वही पार्टी सत्ता में है। बीते सात साल में इस पार्टी की सरकारों की चाहे कोई उपलब्धि हो या ना हो, यह तो साफ है कि उन्होंने हिंदुत्व के एंजेडे को लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। तो जो बात एक समय विचारों में थी (जिसकी वजह से देश के बहुसंख्यक समुदाय में अल्पसंख्यकों के कथित तुष्टिकरण की शिकायत बनी रहती थी) वह अब व्यवहार में उतर चुकी है। अल्पसंख्यक- खासकर मुसलमान आज हर तरह से मुख्यधारा से बाहर कर दिए गए हैँ। इसीलिए अब यह समझना मुश्किल है कि आखिर ऐसी महा-पंचायतें क्यों होती हैं, जिनमें मुसलमानों का भय दिखाय जाता है? खासकर ऐसी महा-पंचायतों का हरियाणा में सिलसिला… Continue reading हरियाणा की ये महा-पंचायतें

लड़ते हैं बाहर जाके ये शेख ओ बिरहमन . . .

ऐसे उदाहरणों की भरमार है जहां कृत्रिम बनाया हुआ हिंदू–मुसलमान का विभाजन जरा भी नहीं चला। हिंदू मृतक को श्मशान ले जाने के लिए परिवार वाले नहीं आए तो पड़ोसी मुसलमानों ने अपना कंधा दिया। हिंदू संस्कारों के हिसाब से मृतक का अंतिम संस्कार किया। उधर मुसलमान का अस्पताल में दम अटका था कि कोई उसके कान में कलमा सुना दे तो वह इत्मीनान से आंखें मूंद ले तो हिंदू डाक्टर ने उसके कान में कलमा पढ़ दिया। संघ भी काम संघ मुसलमानों के साथ मिलकर करता है, बस हिंदूओं को बेवकूफ बनाता है कि मुसलमानों ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं! यह ज्ञान अयोध्या और फैजाबाद के हिंदू-मुसलमान दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने पर हुआ। राम मंदिर के जमीन खरीद घोटाले पर हुई बातों के दौरान एक दोस्त की टिप्पणी सबसे मजेदार थी की हिंदू मुसलमान के बिना मिले इस देश में कुछ नहीं हो सकता। न अच्छा काम न बुरा काम! सही बात है। एक गलत काम के जरिए सही संदेश। घोटाला हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। मगर इसमें दो बातें खास हैं। एक राम मंदिर में भी घोटाला दूसरे मुसलमान के साथ मिलकर। मुसलमान के साथ मिलकर देश निर्माण का जो अच्छा काम चल रहा था उसे तो… Continue reading लड़ते हैं बाहर जाके ये शेख ओ बिरहमन . . .

न होली फीकी पड़ेगी, न गंगा जमनी तहजीब

मनुष्य से ज्यादा गजब-विचित्र जीव कोई नहीं होता। वह परस्थितियों के मुताबिक इतने रूप बदलता है कि सारी धारणाएं ध्वस्त हो जाती हैं। शायद यही जीवन है और इसकी रंगीनी भी।

अखंड भारत के दो विकल्प

मुहम्मदी मजहब में तो जिहाद एक अभिन्न कर्तव्य है। उस की खुली घोषणा है कि दुनिया में शान्ति तभी होगी ‘जब पूरी दुनिया अल्लाह और प्रोफेट मुहम्मद की हो जाएगी’।

भारत कैसे मजहबी उन्माद से निपटे?

आखिर कट्टरवादी-अलगाववादी इस्लामी मान्यताओं-आचरण से सभ्य समाज कैसे निपटें

खाई और गहरी व जिन्ना पैदा

सन् 2020 के 365 दिनों में भारत के टीवी चैनलों और मीडिया में खलनायक नंबर एक कौन था? कौन सी गाली सर्वाधिक हिट थी? देश की राजधानी दिल्ली में पानीपत की लड़ाई के मोहल्ले कौन से थे

लव जिहाद कानून का शीर्षासन

धोखेबाजी, ज़ोर-जबर्दस्ती, लालच या भय के द्वारा धर्म-परिवर्तन करने को मैं पाप-कर्म मानता हूं लेकिन लव-जिहाद के कानून के बारे में जो शंका मैंने शुरु में ही व्यक्त की थी, वह अब सही निकली।

लव-जिहाद, यानी काफिर से नफरत!

इस्लाम मात्र एक धर्म नहीं वरन एक संपूर्ण सभ्यता है। इस के दायरे से जीवन का कोई भी पहलू अछूता नहीं। केवल मुसलमान ही नहीं

क्या आर.एस.एस. हिन्दू धर्म से दूर हो रहा है?

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि धर्म के बारे में अंतिम बात कही जा चुकी है। सभी अन्य मनीषियों ने भी धर्म को केवल विभिन्न रूपों में समझाने का ही कार्य किया। किसी ने उसे सुधारने या बदलने की आवश्यकता नहीं बताई।

‘लव जिहाद’ पर इतनी बहस क्यों?

देश में इस समय कोरोना वायरस के केसेज फिर से बढ़ने शुरू हो गए हैं। कम से कम चार राज्यों में केसेज तेजी से बढ़ रहे हैं और सर्दियों में संक्रमण और मरने वालों की संख्या दोनों में इजाफे का अनुमान है।

शादी के लिए धर्म-परिवर्तन

शादी के खातिर किसी वर या वधू का धर्म-परिवर्तन करना क्या कानूनसम्मत है ? इस प्रश्न का उत्तर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह दिया है कि यह ठीक नहीं है।

अपने नाम और उपनाम कैसे रखें ?

किसी देश का कोई नागरिक अपना या अपने बच्चों का नाम क्या रखे, इस पर तरह-तरह की पाबंदियां कई देशों में हैं। सउदी अरब ने तो ऐसे 51 नामों की सूची जारी कर रखी है, जिन्हें उसका कोई नागरिक नहीं रख सकता।

इस्लाम की आलोचना कैसे करें?

सौ साल पहले, 1920 में लाहौर में मुसलमानों की ओर से दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जो भगवान कृष्ण और महर्षि दयानन्द पर आक्षेप करती थीं। एक ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’, और दूसरी ‘बीसवीं सदी का महर्षि।

इस्लाम के चलते ट्रंप, भटका अमेरिका!

लोकतंत्र की मशाल अमेरिका और वहां डोनाल्ड ट्रंप जैसा मूर्ख-अलोकतांत्रिक व्यक्ति राष्ट्रपति हुआ तो इस त्रासदी का जिम्मेवार कारण इस्लाम है। इस्लाम ने जो स्थितियां बनाई उसमें अमेरिकी बुद्धि जकड़ी।

भारत में मुसलमानों पर जुल्म ?

कल रात लंदन के एक वेबिनार में मैंने भाग लिया। उसमें चर्चा का विषय कश्मीर था और भाग लेनेवालों में दोनों तरफ के कश्मीरी और पाकिस्तानी सज्जन भी थे।

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