लोकतंत्र अपने उजाले में ही मर रहा है!
पिछले हफ्ते वॉशिंगटन पोस्ट में हुई छँटनी चौंकाने वाली नहीं थी। एक कॉरपोरेट फ़ैसले के तहत तीन सौ से ज़्यादा पत्रकार और कर्मचारी निकाल दिए गए। इसे व्यापारिक मजबूरी कहा गया। मतलब संस्था की “बदलती ज़रूरतों” के मुताबिक की गई छंटनी। स्थानीय, अंतरराष्ट्रीय, सांस्कृतिक और फ़ोटो जैसे पूरे रिपोर्टिंग विभाग या तो खत्म कर दिए गए या बेहद छोटे कर दिए गए। सोचिए, यूक्रेन युद्ध कवर कर रहीं एक पत्रकार ने लिखा, “मैं युद्ध क्षेत्र में हूँ और मुझे निकाल दिया गया है।” दिल्ली में तैनात अख़बार के पत्रकारों की भी छुट्टी हुई। कहा जाता है कि लोकतंत्र अँधेरे में...