Nationalism

  • शिक्षण संस्थाओं में अब भाईसाहबों का बोलबाला

    अब भारत में एक भी बौद्धिक, साहित्यिक मंच, पत्रिका नहीं जो देश में भी जानी जाती हो। यह शिक्षा को दलबंदी के हवाले करने से हुआ। अंग्रेज शासक शिक्षा संस्थानों के लिए भारत या बाहर से भी केवल विद्वानों को ही खोज कर लाते थे। जबकि देसी शासक अकादमिक कुर्सियाँ भी प्रायः दलीय कारकूनों, मुंशियों, और वोटार्थ आरक्षितों को थमाते हैं।.. आज शिक्षण संस्थाओं में विद्वानों के बदले भाईसाहबों का बोलबाला उसी की परिणति है। इस बुनियादी हानि की भरपाई कोई आर्थिक आँकड़े नहीं कर सकते, सावधान! राष्ट्रवाद और  हिन्दू अज्ञान परंपरा -3 इस परिदृश्य की तुलना उस शिक्षा से...

  • ‘राष्ट्रवादी’ देसी शासकों ने शिक्षा को बनाया बाँझ

    जो लोग मैकाले को कोसते और 'इंडियन नॉलेज' का डंका पीटते हैं, वही दूसरी साँस में भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर और टीचर 'एक्सपोर्ट' करने की डींग भी हाँकते हैं। जबकि ऐसे भारतीय मैकाले-शिक्षा, यानी अंग्रेजों की देन हैं! इसी तरह, जो 'वसुधैव कुटुंबकम्' बोल कर फूलते हैं, वही अमेरिका और यूरोप को नीच बताते हैं। ऐसे प्रचारक अपनी ही दो बातें जोड़कर विचारने में असमर्थ हैं -- कि उस में क्या संगति है? राष्ट्रवाद और  हिन्दू अज्ञान परंपरा-2   अंग्रेजी राज से पहले, भारतीय परिदृश्य में सदियों से अधिकांश समाज के उत्पीड़न, अपमान, और लाचारी की मौखिक टूटी-फूटी कथाएं, और बाकी...

  • ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ का तोतारटंत तमाशा

    निस्संदेह, भारतीय सभ्यता कभी महान थी। पर हजार सालों से भी अधिक समय से वह जिस हाल में गई और अभी जो है -- उस में गर्व करने के लिए क्या है? उपनिषद, गीता, योगसूत्र, आदि आध्यात्मिक ज्ञान हैं, वह भी हजारों वर्ष पहले के। तक्षशिला या मौर्य साम्राज्य भी सदियों पहले की स्मृतियाँ है। जिन में भी अनेक को विस्मृति से निकाल सामने लाने का काम विदेशियों ने किया। वह करने की हमारी क्षमता ही नहीं थी। सो, बाह्य ज्ञान में हम सदियों से सिफर थे और आध्यात्मिक ज्ञान को हम ने खुद शिक्षा से बाहर रखा हुआ है!...