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एक उपलब्धि, कई सवाल

फिनटेक से संबंधित भारत के महत्त्वपूर्ण डेटा तक अमेरिकी कंपनियों की पैठ गहराती जा रही है। भारत के डिजिटल पेमेंट क्षेत्र पर वॉलमार्ट, गूगल, मेटा आदि जैसी विदेशी कंपनियों का लगभग पूरा नियंत्रण है।

फिनटेक ऐप क्रेड में 90 करोड़ डॉलर के निवेश और क्रेड के संस्थापक कुणाल शाह को ह्वाट्सऐप का वैश्विक प्रमुख बनाने के मेटा के फैसले से उचित ही भारतवासियों में उपलब्धि बोध भरा है। शाह अब अनेक बड़े नामों में शामिल हो गए हैं, जो भारत से शुरुआत करते हुए सबसे बड़ी अमेरिकी कंपनियों में सर्वोच्च पद पर पहुंच गए। यह भारत की तकनीकी एवं प्रबंधकीय शिक्षा व्यवस्था की प्रतिभा तराशने की उच्च क्षमता की एक मिसाल है। मगर इस चकमते सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। ऐसी हर उपलब्धि इस हकीकत को बेनकाब करती है कि भारत प्रतिभाओं का लॉन्च पैड बनने से आगे नहीं बढ़ पाया है।

स्वदेशी प्रतिभाएं भारत में स्टार्ट-अप्स के जरिए अपनी पहचान बनाती हैं, जिन्हें जल्द ही खासकर अमेरिकी कंपनियां खींच ले जाती हैं। नतीजतन, आज तक एक भी भारतीय ब्रांड अपनी अद्वितीय वैश्विक पहचान नहीं बना पाया है। क्रेड के सिलसिले में यह चिंताजनक पहलू भी उभरा है कि भारतीय फिनटेक में रणनीतिक निवेश के जरिए देश के महत्त्वपूर्ण डेटा तक अमेरिकी कंपनियों की पैठ गहराती जा रही है। भारत के डिजिटल पेमेंट क्षेत्र पर वॉलमार्ट, गूगल, मेटा आदि जैसी विदेशी कंपनियों का लगभग पूरा नियंत्रण है। 2018 में लॉन्च हुए क्रेड के आज लगभग एक करोड़ 70 लाख यूजर हैं, जो अपने क्रेडिट कार्ड, बीमा खरीदारी, यूपीआई पेमेंट, ऋण, निवेश आदि से जुड़े कार्य इस कार्ड से करते हैं।

ये भारत के सबसे समृद्ध उपभोक्ता हैं, जिनका बेहद अहम डेटा क्रेड के पास है। आशंका पैदा हुई है कि भविष्य में इस कंपनी अपना निवेश बढ़ाकर मेटा इन सारे आंकड़ों की मालिक बन सकती है। गौरतलब है कि ह्वाट्सऐप का इस्तेमाल भी पेमेंट ऐप के रूप में होता है। यह डेटा मेटा के आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस एजेंट के लिए भी बड़े काम का साबित हो सकता है। भारत में चीन की तरह डेटा ट्रांसफर पर रोक की कारगर कानूनी व्यवस्था नहीं है। ऐसे में संप्रभु एआई या संप्रभु हाई टेक का विकास की बातें खोखली नजर आने लगती हैं। इसीलिए क्रेड और मेटा में बना संबंध चिंता के पहलुओं को भी उजागर कर गया है।

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By NI Editorial

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