भारत का पूंजीवाद अनोखा है

भारत में कुछ बातों को एक झीने परदे में ढक कर रखने की परंपरा रही है। सरकारें पहले भी निजीकरण को बढ़ावा देती थीं, पूंजीपतियों के लिए काम करती थीं

अंबानी के घर ही जाएगा डीएचएफएल समूह!

इन दिनों कहीं भी, कुछ भी बेचा जा रहा है तो दो ही खरीदार दिखाई देते हैं- अंबानी और अडानी। खुदरा कारोबार का बिजनेस हो या रेल, हवाईअड्डा, लॉजिस्टिक कंपनी, टेलीविजन चैनल, जमीनें आदि कुछ भी बिक रहा है तो खरीदार ये ही दोनों हैं।

तो अंबानी, अडानी की बेचैनी बढ़ी

जैसे जैसे किसान आंदोलन लंबा खींचता जा रहा है वैसे वैसे हरियाणा की भाजपा सरकार के साथ साथ देश के दो सबसे बड़े पूंजीपतियों की चिंता बढ़ती जा रही है। ऐसा लग रहा है कि किसान आंदोलन से सबसे ज्यादा बेचैनी हरियाणा के मुख्यमंत्री व उप मुख्यमंत्री को है और उसके बाद अंबानी और अडानी समूह को है।

मानों ‘ब्रेन डेड’ अवस्था और जीवन!

इस पृथ्वी पर भारत वह दास्तां है, जहां लोग लूट, गुलामी में होते हुए भी उसकी सुध में जीते हुए नहीं हैं। वजह गुलामी-लूट के चौदह सौ साल के झटकों से बनी ब्रेन डेड याकि मृत मष्तिष्क अवस्था है।

सरकार से चाहिए समाधान

दिल्ली और आसपास के इलाकों में पारा तीन डिग्री तक गिर जाने के बावजूद दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर खुले आसमान के नीचे 24 दिन से प्रदर्शन कर रहे किसानों ने कहा है कि जब तक सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं लेती है वे अपने घर वापस नहीं लौटने वाले हैं।

किसानों को नए कानूनों का फायदा: मोदी

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन के 24 दिन हो गए हैं। एक तरफ केंद्र सरकार उनसे कह रही है कि बातचीत से समाधान निकालना है तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री लगभग रोज इन कानूनों के फायदे समझा रहे हैं।

बस, किसी तरह लौटे किसान!

यही केंद्र सरकार का फिलहाल नंबर एक मिशन है लेकिन बिना कृषि बिल को वापिस लिए या रद्द किए। सरकार को 20 जनवरी तक हर हाल में दिल्ली-हरियाणा सीमा से किसानों की भीड़ खत्म करानी है।

पंजाबी किसान शहीदी मिजाज का!

हां, पंजाब के सिक्ख किसानों का इन शहीदी महिना है। इसी महिने सिक्खों के दसवें गुरू के दो बेटे दिल्ली दरबार के औरंगजेब से लड़ते हुए शहीद हुए थे और दो बेटे सरहिंद में दीवाल में चीने गए।

किसानों की ‘अमीरी’ देखी नहीं जा रही!

प्रचार हो रहा है कि ये कैसे किसान हैं, जो जिंस की पैंट-जैकेट पहनते हैं, पिज्जा खाते हैं, मसाज कराते हैं, बड़ी गाड़ियों से आते हैं और ट्रैक्टर पर डीजे बजा कर डांस करते हैं।

कैसे संचालित हो रहा आंदोलन?

यह यक्ष प्रश्न की तरह है कि आखिर इतना लंबा चलने वाला, इतना बड़ा और प्रभावी किसान आंदोलन कैसे संचालित हो रहा है

ईस्ट इंडिया कंपनी व अंबानी-अडानी में क्या फर्क?

अहम फर्क यह कि ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक गोरे अंग्रेज थे तो अंबानी-अडानी हिंदुस्तानी अश्वेत चेहरों वाले हैं। अन्यथा दोनों धंधे-मुनाफे के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाले।

‘उत्तम खेती’ होगी चाकरी में कन्वर्ट!

किसान मौत का वारंट लटका बूझ रहा है तो मोदी सरकार किसानों के उड़ने की ‘एक नई आजादी’ के सपने में है। कौन सही-कौन गलत? पहले सरकार की दलीलों पर गौर करें।

किसानों ने जवाब और चेतावनी दी

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों ने ठीक एक हफ्ते बाद केंद्र सरकार की ओर से दिए गए प्रस्ताव पर अपना जवाब भेजा है। किसान संगठनों ने कहा है कि उन्होंने केंद्र सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट खत्म कराएगा आंदोलन!

केंद्र सरकार जो काम नहीं कर सकी है वह काम अब सुप्रीम कोर्ट करेगा। केंद्र सरकार ने किसान संगठनों के साथ बातचीत में कहा था कि वह कृषि विशेषज्ञों, किसान संगठनों के नेताओं और सरकार के लोगों को मिला कर एक कमेटी बना देगी, जो कृषि कानूनों से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार करेगी।

खेती पर अंबानी-अडानी की पुरानी नजर!

अंबानी-अडानी के धंधे का रामबाण नुस्खा भारत की 138 करोड़ आबादी पर कंट्रोल है। धीरूभाई अंबानी ने साठ के दशक में इंदिरा दरबार से धागे के आयात का लाइसेंस ले कर कपड़े याकि टेक्सटाइल क्षेत्र पर कब्जे के बिजनेस प्लान में काम किया तो वह भीड़ की सस्ते कपड़े की जरूरत से था।

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