baby do die do

  • एक मूक स्त्री की चीख: ‘बेबी डू डाई डू’

    फ़िल्म का शीर्षक भी अपने भीतर एक विचित्र बेचैनी समेटे हुए है। 'बेबी डू डाई डू' किसी लोकप्रिय धुन जैसा सुनाई देता है, लेकिन फ़िल्म देखते हुए महसूस होता है कि यह जीवन के एक अंतहीन चक्र का रूपक है, करो, बचो, गिरो, फिर उठो। यहां मृत्यु केवल शरीर की नहीं, संवेदनाओं की भी है। सिने-सोहबत हर दौर का सिनेमा अपने समय की बेचैनियों का दस्तावेज़ होता है। कुछ फ़िल्में हमें हंसाती हैं, कुछ रुलाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी हमारे भीतर चलती रहती हैं। निर्देशक नचिकेत सामंत की 'बेबी डू...