क्यों बहुसंख्यक संकोच में रहे?
असल मुद्दा सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत आत्मबोध का है। जब बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग अपने ही मजहबी-सांस्कृतिक प्रतीकों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में संकोच करता है, तो इसकी जड़े उस मानसिक औपनिवेशवाद में मिलती है, जिसमें अपनी पहचान, संस्कृति और परंपरा के प्रति उदासीनता और हीन-भावना रखने का चिंतन होता है। सच्चा ‘सह-अस्तित्व’ तभी संभव है, जब सभी परंपराओं को एक जैसा सम्मान और स्थान मिले। पिछले सप्ताह मुझे एक रिटायर आई.ए.एस मित्र ने मुझसे अपने प्रशिक्षण काल की एक स्मृति साझा की। उनके मुताबिक, अकादमी के भीतर दिसंबर के दिनों ईसा मसीह के जन्म से संबंधित...