Christmas

  • क्यों बहुसंख्यक संकोच में रहे?

    असल मुद्दा सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत आत्मबोध का है। जब बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग अपने ही मजहबी-सांस्कृतिक प्रतीकों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में संकोच करता है, तो इसकी जड़े उस मानसिक औपनिवेशवाद में मिलती है, जिसमें अपनी पहचान, संस्कृति और परंपरा के प्रति उदासीनता और हीन-भावना रखने का चिंतन होता है। सच्चा ‘सह-अस्तित्व’ तभी संभव है, जब सभी परंपराओं को एक जैसा सम्मान और स्थान मिले। पिछले सप्ताह मुझे एक रिटायर आई.ए.एस मित्र ने मुझसे अपने प्रशिक्षण काल की एक स्मृति साझा की। उनके मुताबिक, अकादमी के भीतर दिसंबर के दिनों ईसा मसीह के जन्म से संबंधित...

  • क्रिसमस, आतंकवाद और बेबस यूरोप

    आखिर भय का माहौल कौन बना रहा है? फ्रांसीसी मीडिया में मैनहैटन इंस्टीट्यूट के आप्रवासन सदस्य डैनियल डी मार्टिनो के हवाले से कहा गया है, “स्पष्ट है कि यह यूरोप में बिना समुचित जांच के बड़े पैमाने पर मुस्लिम प्रवासन का परिणाम है।” यह घटनाक्रम एक ऐसे गहरे संकट को उजागर करता है, जिसमें तथाकथित ‘उदार’ समाज स्वयं ही अपने विनाश की पटकथा लिख रहा है। पूरी दुनिया में 25 दिसंबर को क्रिसमस का पर्व मना। यह उत्सव अब किसी एक मजहब तक सीमित नहीं रह गया है। चाहे ईसाई हो या गैर-ईसाई— सब इस पर्व का हिस्सा बनते हैं।...