‘डांसिंग भालूओं के बचाने, संरक्षण की दास्तां
भारत में अंतिम डांसिंग भालू अदित का 2009 में बचाया जाना इस कुप्रथा के औपचारिक अंत का प्रतीक है, लेकिन इससे जुड़े नैतिक और नीतिगत प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होते। क्या वन्यजीव संरक्षण केवल कानून की भाषा में सीमित रह सकता है, या उसे सामाजिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और शिक्षा की नीतियों के साथ जोड़कर देखना अनिवार्य है? स्लॉथ भालुओं का लंबे समय तक चला ‘डांसिंग भालू’ शोषण‑मॉडल अब लगभग समाप्त है। इसके केंद्र में एक संगठित, मानवीय व वैज्ञानिक दृष्टि से समर्थ संरक्षण आंदोलन खड़ा है। यह बदलाव केवल एक प्रजाति को बचाने की कहानी नहीं, बल्कि कानून, करुणा...