समय की लीला के डमरू ओह, समय!
बेचारा हुंकारों, झांकियों के फोटो और रीलों के शोर में दबा और ठिठका तथा देश-दुनिया को एक साथ डांवाडोल करता हुआ। साल छब्बीस की जनवरी के पहले ही पखवाड़े में भारत और दुनिया ने बहुत कुछ देखा। मंदिरों में उमड़ा हिंदुओं का सैलाब तो प्रधानमंत्री डमरू, बछड़े से प्रजा को झूमाते, थिरकाते हुए। भारत की सौ साल पहले पहचान सांप-सपेरों के फोटो से थी। आज वह पहचान डमरू, बछड़े और आस्था में उमड़ती भीड़ की है। सो, नया जमाना है राजा के डमरू का, झांकियों और प्रजा के नाचने का। गाय है, गंगा है और फल-पुण्य प्राप्ति के लिए मंदिरों...