‘ग़जब रात’: अंधेरे में ज़मीर की रोशनी
इस फ़िल्म का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि इसका नायक कोई आदर्शवादी पुलिसवाला नहीं है। वह एक ऐसा आदमी है जिसे अपनी बेईमानी पर कभी शर्म नहीं आई। मगर एक रात उसे किसी अनजान की तकलीफ़ अपनी तकलीफ़ लगने लगती है। शायद इंसानियत का पहला क़दम यही होता है कि किसी दूसरे के दर्द में अपना थोड़ा-सा हिस्सा पहचान लेना। रात कितनी भी गहरी हो, सुबह होने की एक संभावना हमेशा बची रहती है। रात की भी अपनी एक ज़ुबान होती है। दिन के उजाले में जो चेहरे अपने किरदारों के पीछे छिपे रहते हैं, रात उन्हें थोड़ा बेनक़ाब...