नरवणे, कमान और नेतृत्व का मौन से पलायन
अगस्त 2020 में जब लद्दाख की सीमा के रेज़िन ला पर चीनी बख़्तरबंद दस्ते हिमालयी सीमा पर भारतीय ठिकानों की ओर बढ़ रहे थे तो वह बेहद नाज़ुक क्षण था। सेनाध्यक्ष नरवणे ने राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट दिशा माँगी। पर उन्हे उत्तर मिला—“जो आपको ठीक लगे, वही करें”—वह मार्गदर्शन नहीं था। यह ज़िम्मेदारी से बचने का तरीका था। यह नेतृत्व का ज़िम्मेदारी से पल्ला छोड़ना था।...महान राष्ट्र अपने जनरलों की प्रतिभा से नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक निर्णयों की स्पष्टता से पहचाने जाते हैं। सतीश झा जब पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा सार्वजनिक चर्चा में आई, तो विवाद...