वर्जनाओं को तोड़ने की एक सार्थक पहल
किशोरवय के बच्चों की ज़िंदगी में ‘इंफ़ेच्युएशन’ और ‘लव’ के बीच के फ़र्क़ को समझने और उसे मैच्युरिटी से संभालने की दिशा में अपने इकोसिस्टम से सीखते समझते किरदारों की कहानी पर आधारित है ‘girls will be girls’। यह एक एक बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली फ़िल्म है, जो मां-बेटी के जटिल और गहराई से भरे रिश्ते पर आधारित है। हिंदुस्तानी समाज में सेक्स शब्द किसी टैबू से कम नहीं है। इस शब्द के किसी पब्लिक प्लेस या फिर घर की गैदरिंग में भी उच्चारण मात्र से ऐसा लगता है जैसे कोई बम फट जाता हो। ज़्यादातर लोग सेक्स के बारे...