खोपड़ी बिन हिंदू राजनीति!
यह न मेरा निष्कर्ष है, न कोई नई बात। जिस कथित हिंदू राजनीति का इतना शोर है, उसके भय, भूख, भक्ति और लूट के बीज न सावरकर की पुस्तकों में मिलते हैं और न स्वतंत्र भारत में सेकुलरवाद तथा इस्लामी आक्रमणों की सबसे तीखी आलोचना करने वाले स्वामी करपात्री, सीताराम गोयल या अरुण शौरी की लेखनी में। स्वामी करपात्री वे दबंग और तात्त्विक चिंतक थे, जिन्होंने 1952 के पहले आम चुनाव में हिंदू कोड बिल और गौहत्या प्रतिबंध को मुद्दा बनाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू के विरुद्ध स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी को चुनाव मैदान में उतारा। हालात ऐसे बने कि नेहरू को...