तभी काबिल लोग देश छोड़ जा रहे हैं।
गत आठ दशकों में विविध क्षेत्रों में तबाह, परेशान, अपमानित होने वाले करोड़ों हिन्दू केवल इसलिए दुर्गति में पड़े, क्योंकि अंग्रेजों का स्थान लेने के ख्वाहिशमंद हिन्दू नेता राजनीति के मूल तत्व से लापरवाह रहे हैं। वह कि जिम्मेदारी से अपने को दाँव पर लगाकर, दृढ़ता से ही राज्य एवं उस में रहने वाली जनता की रक्षा होती है। किन्हीं आडंबरों, सूक्तियों, दूसरों को दोष, या तीसरों को प्रेरित करने से नहीं। हिन्दू राजनीति का दिवालियापन-2 ऐसी भोली राजनीति का आरंभ प्रथम विश्व-युद्ध में बिना शर्त अंग्रेजों की मदद करने से हुआ। तब तिलक, एनी बेसेंट, जिन्ना, जैसे नेता 'होम-रूल'...