पत्रकारिता के क्षेत्र में गिरावट क्यों…? पत्रकार बदनाम क्यों…?

बदलते समय और बदलती सोच के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है इस मुद्दे पर आज देश में  गर्मा गरम बहस भी छिड चुकी है।

Rajasthan : गहलोत सरकार के 3 साल पूरे होने पर पूनियां ने कहा- इसमें खुश होने जैसा कुछ नहीं है…

राजस्थान BJP इकाई के अध्यक्ष सतीश पूनियां ने गहलोत सरकार पर हमला बोला है. उन्होंने कहा है कि राजस्थान की कांग्रेस…

Uttar Pradesh : योगी आदित्यनाथ को लिखा Blood Later, विधानसभा चुनाव के पहले बढ़ा दबाव…

शिक्षक भर्ती मामले को लेकर आंदोलनकारी अभ्यर्थियों ने सीएम योगी आदित्यनाथ को खून से चिट्ठी लिख कर भेजी है. सीएम योगी आदित्यनाथ…

झाड़ू भारत की राजनीति को काटती है और आस्था तक भी ले जाती है..जानें राजनेताओं के झाड़ू से जुड़ाव

झाड़ू बीआर अम्बेडकर के लिए दासता का प्रतीक था जिन्होंने अछूतों द्वारा झेले गए कई अपमानों के बारे में लिखा था जिन्हें वे तब जानते थे।

6 महीने में 6 मुख्यमंत्री: भारतीय राजनीति में मौसम का बदलाव या नया सामान्य?

सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के संस्थापक अध्यक्ष चामलिंग ने 1994 और 2019 के बीच सिक्किम पर शासन किया। उनके बाद ज्योति बसु हैं, जिन्होंने 1977 और 2000 के बीच पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य क

हज हाउस के बाद अब ‘कांवड़ हाउस’, किस ओर जा रही है देश की राजनीति…

आपने कभी कांवड़ हाउस के बारे में सुना है?? जाहिर सी बात है कि आपने इसके बारे में पहले कभी नहीं सुना होगा. लेकिन आने वाले दिनों में यह सोशल मीडिया में ट्रेंड करता…

लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर

क्या कभी आप ने सोचा कि प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, कमलेश्वर और खुशवंत सिंह ने जन्म लेना क्यों बंद कर दिया? कबीर-रहीम तो छोड़िए; रवींद्र नाथ टैगोर, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर भी अब क्यों पैदा नहीं होते? मीर और ग़ालिब को जाने दीजिए; फ़िराक़ गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी और बशीर बद्र तक अब जन्म क्यों नहीं लेते? कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, पंडित रविशंकर और एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के गुण-सूत्र अब क्यों दिखाई नहीं देते? होमी जहांगीर भाभा और हरगोविंद खुराना के बाद हमारे विज्ञान-जगत की गर्भधारण क्षमता को क्या हो गया है? यह भी पढ़ें: सिंहासन-सप्तपदी के सात बरस बाद क्या आप ने कभी सोचा कि सियासत रेगिस्तानी क्यों होती जा रही है? छोटे हों या बड़े, जो राजनीतिक दल पहले हरे-भरे गुलमोहर हुआ करते थे, अब वे बबूल के ठूंठों में तब्दील क्यों होते जा रहे हैं? तमाम उठापटक के बावजूद अंतःसंबंधों का जो झरना राजनीतिक संगठनों के भीतर और बाहर बहता था, उसकी फुहारें सूखती क्यों जा रही हैं? परिवार और कुनबा-भाव आपसी छीना-झपटी की हवस से सराबोर क्यों होता जा रहा है? वैचारिक सिद्धांतों पर आधारित पारस्परिक जुड़ाव की ओस-बूंदें मतलबपरस्ती के अंगारों में क्यों बदलती जा रही हैं? आंखों का परिस्थितिजन्य तिरछापन नफ़रत के… Continue reading लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर

PM Modi ने रोने के मामले में जवाहर लाल नेहरू को भी पीछे छोड़ा, जानें कब मुश्किल परिस्थितियों में नेहरू की भर आई थी आंखें

ये कोई नयी बात नहीं है जब किसी प्रधानमंत्री ने रोकर लोगों से अपनी संवेदनाएं जाहिर की है. इसके पहले भी पीएम मोदी नोटबंदी के समय भावुक हो गये थे. उस समय देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी अचानक …

क्षत्रपों की तीसरी पीढ़ी का समय

प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी कांग्रेस के वंशवाद को बड़ा मुद्दा बनाते रहे हैं। उनके लिए वंशवाद का मतलब गांधी-नेहरू परिवार है, जिसकी पांचवीं पीढ़ी के राहुल और प्रियंका राजनीति कर रहे हैं। इनके अलावा पांच पीढ़ी से राजनीति करने वाले परिवार गिने-चुने हैं। पिछले तीन-चार दशक में देश में जो प्रादेशिक क्षत्रप उभरे और उनकी दूसरी पीढ़ी इस समय सक्रिय है। उन्हीं में कुछ परिवारों की दूसरी और कुछ की तीसरी पीढ़ी अब राजनीति में आ गई है और सफल हो गई है। तमाम विरोध और दुष्प्रचार के बावजूद इस इस पीढ़ी ने अपने लिए जगह बनाई है और तमाम बड़े नेताओं के लिए चुनौती बन रहे हैं। इसमें सबसे पहले ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का नाम लिया जा सकता है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अलावा दूसरा सबसे बड़ा टारगेट अभिषेक बनर्जी थे। प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री तक ने उनको निशाना बनाया। उनकी पत्नी और ससुराल वालों से सीबीआई ने पूछताछ की। लेकिन अभिषेक बनर्जी चुनाव मैदान में डटे रहे और भाजपा व उसके शीर्ष नेताओं पर सीधा हमला करते रहे। पश्चिम बंगाल में ममता की तीसरी बार की जीत ने अभिषेक बनर्जी यानी एबी का कद बहुत बड़ा कर दिया है।… Continue reading क्षत्रपों की तीसरी पीढ़ी का समय

भारतीय राजनीति का नया दौर !

New Era Of Politics : पिछले करीब तीन दशक में अस्मिता की राजनीति पूरे देश में एक समान रूप से स्थापित हो गई है…

परिवार आधारित राजनीति के खात्मे के लिए आगे आये युवा : मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज कहा कि भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार एवं भाई-भतीजा वाद के स्थान पर ईमानदारी एवं प्रदर्शन को जगह मिल रही है।

विरोध की यह कैसी संस्कृति!

भारत की राजनीति और चुनाव को लेकर कुछ सवाल सनातन हैं, जैसे सत्ता विरोध का प्रकटीकरण कैसे होगा या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से असहमति या उससे विरोध का इजहार कैसे होगा? लंबे चुनावी इतिहास के बावजूद भारत में इन सवालों का स्पष्ट और स्वीकार्य जवाब नहीं मिला है।

कैसा वक्त और कैसी सियासी नैतिकता?

राजनैतिक विचारधाराओं का अपना नैतिक मूल्य होता है। राजनीति विचारधारा के लिए जानी जाती है, हर राजनेता के अपने वैचारिक मन्वन्तर हुआ करते हैं लेकिन बदलते राजनैतिक दौर में राजनितिक विचारधारा का कोई नैतिक मूल्य नहीं रहा।

किस दिशा में बढ़ रही है राजनीति?

देश की राजनीति किस दिशा में बढ़ रही है? क्या इसकी दिशा बदल रही है या पिछले सात दशक में जैसी राजनीति होती रही है वैसी ही हो रही है, उसमें मामूली बदलाव आ रहा है? इन  सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। क्योंकि एक स्तर पर देखने में लगता है कि राजनीति की दिशा पूरी तरह से बदल गई है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी जैसी राजनीति कर रही है या उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की जैसी राजनीति है या कुछ हद तक समाजवादी पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियों की राजनीति है। सबकी राजनीति कुछ बुनियादी तत्वों में बदलाव का इशारा करती है। इस लिहाज से कांग्रेस दुविधा में है और तभी उसे न माया मिलती दिख रही है और न राम! भारतीय राजनीति का सबसे बुनियादी बदलाव मुस्लिम वोट बैंक के लिहाज से हुआ दिख रहा है। दशकों तक मुस्लिम एक वोट बैंक था और उसकी सरपरस्ती करने वाली पार्टियां मजबूत स्थिति में थीं। केंद्र में और अनेक राज्यों में कांग्रेस पार्टी उनकी सरपरस्त थीं। क्षेत्रीय पार्टियों के उदय के बाद कांग्रेस की स्थिति जहां जहां कमजोर हुई वहां ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की राजनीति करने वाली पार्टियों का उदय हुआ। जैसे बिहार में राष्ट्रीय… Continue reading किस दिशा में बढ़ रही है राजनीति?

केजरीवाल मॉडल से क्यों उड़ी विपक्ष की नींद

दिल्ली की सत्ता में जोरदार वापसी कर अरविंद केजरीवाल ने दिखा दिया है कि भारतीय राजनीति में वह महज संयोग नहीं, बल्कि प्रयोग के दम पर खुद को स्थापित करने में सफल रहे हैं।

और लोड करें