‘मां-बहन’: रिश्तों की गालियों से गरिमा तक की सिनेमाई यात्रा
यहां स्त्री-विमर्श है, लेकिन नारेबाज़ी नहीं। यहां सामाजिक टिप्पणी है, लेकिन उपदेश नहीं। यहाँ संवेदनशीलता है, लेकिन भावुकता का अतिरेक नहीं। तकनीकी पक्ष की बात करें तो फ़िल्म का कैमरा वर्क कहानी के स्वभाव के अनुरूप है। चमक-दमक से दूर, वास्तविक जीवन के करीब। फ्रेम्स में एक तरह की घरेलू घुटन भी है और आत्मीयता भी। हिंदी भाषा में कुछ शब्द ऐसे हैं, जो अपने शाब्दिक अर्थ से कहीं अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ लेकर चलते हैं। ‘मां-बहन’ उन्हीं शब्दों में से एक है। रोज़मर्रा की बातचीत में यह अक्सर गाली का हिस्सा बन जाता है, लेकिन जब यही शब्द...