विरह और वापसी का सिनेमाई राग: ‘मैं वापस आऊंगा’
इम्तियाज़ अली की यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि सीमाएं देशों को बांट सकती हैं, लेकिन स्मृतियों को नहीं। समय शरीर को बूढ़ा कर सकता है, लेकिन प्रेम को नहीं। और शायद इसलिए फ़िल्म का शीर्षक अंततः एक वादा बन जाता है, “मैं वापस आऊंगा”। किसी व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि उस प्रेम की तरह जो कभी मरता नहीं। सिने -सोहबत इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की दुनिया में प्रेम कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। वह हमेशा भटकता है, टूटता है, खुद को खोजता है और अंततः किसी गहरे आत्मबोध तक पहुंचता है। 'जब वी मेट' का प्रेम आत्मविश्वास...