कांग्रेस के वकील प्रशांत भूषण के साथ नहीं

देश भर के वकीलों ने अवमानना के मामले में प्रशांत भूषण का साथ दिया है। सैकड़ों की संख्या में वकीलों ने याचिका पर दस्तखत किए और प्रशांत भूषण को सजा नहीं देने की अपील की।

वेणुगोपाल की वाह और…

वाह! कैसे सलाम किया जाए 89 साला बुजुर्ग केके वेणुगोपाल को! वेणुगोपाल भारत सरकार के अटॉर्नी-जनरल हैं और पांचवें दशक से सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं।

कानून की मशाल लेकर चलने वाले

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके उस समय के चीफ जस्टिस के कामकाज की शैली पर सवाल उठाए थे वह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मील के पत्थर का दर्जा रखता है। लोग हैरान थे पर करोड़ों लोगों के मुंह से वाह निकली थी। हालांकि उस प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद जस्टिस रंजन गोगोई जब चीफ जस्टिस बने तो उन्होंने जैसे फैसले दिए, अपने खिलाफ दर्ज हुए यौन उत्पीड़न के मामले में जैसे काम किया और बाद में जैसा आचरण किया उससे चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस ले मिली सारी पुण्यता खत्म हो गई। बाकी सारे जज भी रिटायर होते गए और नेपथ्य में चले गए। उन जजों के पहले से और उनके बाद भी देश की सर्वोच्च अदालत में ऐसे चेहरे मौजूद हैं, जिन्होंने कानून और न्याय की मशाल थाम रखी है और सारे खतरे उठाते हुए उस मशाल की लौ जलाए हुए हैं। फली एस नरीमन, दुष्यंत दवे और राजीव धवन का नाम ऐसे लोगों में लिया जा सकता है, जिन्होंने हमेशा गलत को गलत कहने की हिम्मत दिलाई।
कोरोना वायरस के संकट के समानांतर जब लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों के पलायन की ऐतिहासिक मानवीय आपदा आई और उसमें सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का पक्ष स्वीकार करते हुए मजदूरों को राहत देने का फैसला नहीं किया तो सबसे पहली प्रतिक्रिया फली एस नरीमन की थी। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘अपैलिंगली’ यानी बहुत खराब, भयावह, डरावना फैसला किया है। इसके बाद जब कर्नाटक हाई कोर्ट ने मजदूरों को घर पहुंचाने की व्यवस्था करने का फैसला सुनाया तब भी उन जजों को सैल्यूट करने वालों में फली नरीमन पहले थे। उन्होंने इसे ताजा हवा के झोंके की तरह बताया और सबको यह फैसला पढ़ने की सलाह दी। असल में वे एक विरासत को पिछले करीब पांच दशक से अपने कंधों पर लेकर चल रहे हैं। जिस समय देश में इमरजेंसी लगाई गई उस समय वे इंदिरा गांधी की सरकार में एडिशनल सॉलिसीटर जनरल थे और उन्होंने यह सूचना मिलते ही इस्तीफा दिया था।
दूसरा नाम, दुष्यंत दवे का है। बिना किसी हिचक के उन्हें मौजूदा समय का सबसे सजग, सक्रिय, सामाजिक व कानूनी सरोकारों की चिंता करने वाला और सार्वजनिक कानूनविद् कहा जा सकता है। उन्होंने साबित किया है कि कानून का पेशा उनके लिए सिर्फ पैसे कमाने या कोई पद हासिल करने का जरिया नहीं है। उन्होंने जन सरोकारों की रक्षा और संविधान के प्रावधानों को बचाने के लिए हर बार अपने को आगे किया। चाहे प्रवासी मजदूरों के पलायन का मामला हो, कार्यपालिका के आदेशों से आम लोगों के हितों की रक्षा का मामला हो, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चिंता हो, मीडिया और सोशल मीडिय में नफरत फैलाने वाले भाषणों-बयानों का मामला हो, अभिव्यक्ति की आजादी का मामला हो या कोरोना के संकट के बीच न्यायपालिका और विधायिका दोनों की गैरहाजिरी का मामला हो, ये सारे मुद्दे दुष्यंत दवे ने उठाए। उन्होंने न सिर्फ इनसे जुड़े मुकदमे अदालत मे लड़े, बल्कि सार्वजनिक रूप से लिख कर अपना पक्ष सार्वजनिक किया और इस क्रम में उन्होंने बड़े खतरे उठाए। सोशल मीडिया में भक्त लंगूरों की गालियां झेलने के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ एक याचिका भी दायर की गई है, जिसमें उनका वरिष्ठ वकील का तमगा वापस लेने की मांग की गई है।
तीसरा नाम राजीव धवन का है। अयोध्या मामले में राजीव धवन मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनको पता था कि वे इस वजह से मुस्लिमपरस्त कहे जाएंगे और देश की बड़ी आबादी की नफरत का शिकार होना पड़ सकता है। पर यह जोखिम लेकर उन्होंने कानून का काम किया। हालांकि उनकी पहचान सिर्फ इससे नहीं है। वे अपनी सोच में बहुत स्पष्ट रहे हैं और कभी इस बात की परवाह नहीं की है, जो सत्ता में है उसके मन की बात कही जाए। तभी 2009 में जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए अपने सत्ता के शिखर पर थी तब उन्होंने बोफोर्स तोप सौदे को लेकर कानूनी गड़बड़ियों का खुलासा किया था। उन्होंने अंग्रेजी के एक अखबार में लेख लिख कर बताया था कि किस तरह से मुकदमे को कमजोर किया गया, क्वात्रोच्चि को भारत से बाहर जाने दिया। उन्होंने यूपीए सरकार के अटॉर्नी जनरल मिलन बनर्जी की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। राजीव धवन ने सीधे दिवंगत राजीव गांधी को कठघरे में खड़ा किया था। उनमें यह कहने की हिम्मत थी कि जनहित याचिका ने आम लोगों की मदद की है पर साथ ही पूंजीपतियों, वकीलों और जजों को भी फायदा पहुंचाया है। वे बोलने की आजादी की रक्षा के लिए आज भी प्रशांत भूषण के साथ खड़े हैं और पहले भी संविधान से छेड़छाड़ के हर मसले पर वे एक पक्ष बन कर अदालत में खड़े रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट : सजा पर सुनवाई की भूषण की मांग खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने आज वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही में सजा तय करने संबंधी दलीलों की सुनवाई शीर्ष अदालत की दूसरी पीठ द्वारा की जाए।

संस्थाएं बचेंगी तो देश बचेगा

शेक्सपीयर के मशहूर नाटक ‘हैमलेट’ की यह लाइन कि ‘समथिंग इज रॉटेन इन द स्टेट ऑफ डेनमार्क’ कई संदर्भों में अलग-अलग तरह से दोहराई जा चुकी है।

शाह पर सवाल उठाने के लिए प्रशांत भूषण पर भड़की भाजपा

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जब दिल्ली चुनाव जीतने के गृहमंत्री अमित शाह के दावे को लेकर कुछ सवाल खड़े किए तो भाजपा उनपर भड़क उठी।

प्रशांत भूषण किसी और मामले का सहारा नहीं ले सकते : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। प्रधान न्यायाधीश एस.ए. बोबडे ने मंगलवार को एक एनजीओ के लोकस स्टैंडाई पर सवाल उठाया। इस एनजीओ का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण एक मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा और वरिष्ठ कांग्रेस नेता डी.के.शिवकुमार के खिलाफ बंद हो चुके भ्रष्टाचार के मामले को फिर से खोलने की मांग कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वकील प्रशांत भूषण से कहा आप किसी के कंधे का इस्तेमाल नहीं कर सकते। प्रशांत भूषण, एनजीओ समाज परिवर्तन समुदाय की तरफ से पेश हो रहे हैं। एनजीओ ने येदियुरप्पा व शिवकुमार के खिलाफ एक भूमि की अधिसूचना रद्द करने के मामले को फिर से खोलने की मांग की है। प्रधान न्यायाधीश एस.ए.बोबडे ने प्रशांत भूषण से कहा हमें दिखाएं कि लोकायुक्त के समक्ष आपकी शिकायत में क्या हुआ। इस पीठ की अगुवाई प्रधान न्यायाधीश कर रहे हैं और इसमें न्यायमूर्ति बी.आर.गवई और सूर्यकांत भी शामिल हैं। पीठ ने भूषण से कहा कि अगर उन्होंने शिकायत दर्ज कराई है तो दिखाएं। मामले को दो हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया गया। मुवक्किल के शिकायत के घटनाक्रम को बताते हुए भूषण ने कहा कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री के समक्ष एक रिप्रजेंटेशन प्रस्तुत किया था। प्रधान न्यायाधीश ने हस्तक्षेप करते… Continue reading प्रशांत भूषण किसी और मामले का सहारा नहीं ले सकते : सुप्रीम कोर्ट

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