बेतुकेपन का रंगमंच
लोकतंत्र में लोकलाज का परदा उतार फेंका जाए, तो फिर बेपदर्गी किस हद तक जाएगी, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन हो जाता है। तब राजनीति बेतुकेपन का रंगमंच बन जाती है, जो आज हमारी हकीकत है। एक राजनीतिक दल, जिसके बारे में कहीं जाना-सुना नहीं गया हो और अपने पूरे चुनावी इतिहास में जिसने एक हजार वोट भी हासिल ना किए हों, उसके अचानक लोकसभा में 20 सदस्य हो जाएं, तो इस घटनाक्रम के बेतुकेपन का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस छोड़कर निकले और नेशनलिस्ट सिटिजेन्स पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए इन सांसदों में...