लोकतंत्र में लोकलाज का परदा उतार फेंका जाए, तो फिर बेपदर्गी किस हद तक जाएगी, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन हो जाता है। तब राजनीति बेतुकेपन का रंगमंच बन जाती है, जो आज हमारी हकीकत है।
एक राजनीतिक दल, जिसके बारे में कहीं जाना-सुना नहीं गया हो और अपने पूरे चुनावी इतिहास में जिसने एक हजार वोट भी हासिल ना किए हों, उसके अचानक लोकसभा में 20 सदस्य हो जाएं, तो इस घटनाक्रम के बेतुकेपन का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस छोड़कर निकले और नेशनलिस्ट सिटिजेन्स पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए इन सांसदों में कुछ को नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री भी बनाया जा सकता है। वैसे, बेतरतीब घटनाओं की शृंखला में यह सिर्फ एक नई कड़ी है। अभी कुछ ही समय पहले सात राज्यसभा सदस्य आम आदमी पार्टी से निकले और दल विभाजन की प्रक्रिया पूरी हुए बिना भाजपा में शामिल हो गए थे। इन दोनों मामलों में दल-बदल निरोधक कानून आवाक और लाचार खड़ा है।
सबको मालूम है कि कभी कानून के अमल का अभिनय हुआ भी, तो तब तक समय इतना गुजर चुका होगा कि उसका सिर्फ अकादमिक महत्त्व ही रह जाएगा। यही बात राज्यसभा चुनाव में मध्य प्रदेश से कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के मामले में भी लागू होती है, जिसमें चुनावी प्रक्रिया को दुर्भावनापूर्ण ढंग से दूषित करने के आरोप लगे हैं। उधर बिहार में सत्ताधारी एनडीए के घटक राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए रखने के लिए संवैधानिक प्रावधान को जैसे धता बताया गया, वह कम अमर्यादित नहीं है। प्रकाश को मंत्री बनाया गया, लेकिन छह महीने की अवधि के अंदर विधायक बनने की अनिवार्यता वे पूरी नहीं कर सके। तो उनसे इस्तीफा लेकर फिर मंत्री बना दिया गया। इस तरह उनके लिए छह महीने के एक और कार्यकाल का इंतजाम किया गया है! यह सब खुलेआम और डंके की चोट पर हो रहा है। इन सबने यह यकीन सबके मन में बैठा दिया है कि इस दौर में सब कुछ “मुमकिन है”। इस दौर का तजुर्बा यह बताता है कि लोकतंत्र में जब लोकलाज का परदा उतार फेंका जाता है, तो फिर बेपदर्गी किस हद तक जाएगी, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन हो जाता है। तब राजनीति बेतुकेपन का रंगमंच बन जाती है, जो आज हमारी हकीकत है।
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