• टूटता हुआ एक नैरेटिव

    ताजा घटनाएं बताती हैं कि आतंकवादियों का साया जम्मू में कितने बड़े दायरे में फैल गया है। जाहिर है कि जम्मू अब आतंकवाद के नए केंद्र के रूप में उभरा है। अनुमान है कि आतंकवादी सीमापार से घुसपैठ कर वहां पहुंच रहे हैं। जम्मू इलाके में ताजा आतंकवादी हमलों ने केंद्र सरकार के इस दावे पर गंभीर प्रश्न उठा दिया है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को परास्त कर दिया गया है। हालांकि कुछ-कुछ अंतराल पर कश्मीर घाटी में भी हमले होते रहे हैं, लेकिन जिस तरह जम्मू क्षेत्र में लगातार ऐसी घटनाएं हुईं, उनसे देश में सरकारी दावे से पैदा...

  • हताशा का आलम

    जहां युवा बेरोजगारी असामान्य रूप से ऊंची हो और खाद्य मुद्रास्फीति लगातार आठ प्रतिशत से ऊपर हो, वहां कैसी जिंदगी की कल्पना की जा सकती है? अप्रैल के जारी ताजा आंकड़ों में भी खाद्य मुद्रास्फीति 8.7 प्रतिशत दर्ज हुई है। कुवैत में विदेशी मजदूरों के एक रहवास में हुए भयंकर अग्निकांड में मरे 49 लोगों में तकरीबन 40 भारतीय हैं। उधर रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में भाड़े के सैनिक के तौर पर गए दो और भारतीयों की मौत हो गई है। ये भारतीय उन 30 लोगों से अलग हैं, जिनके परिजनों ने भारत सरकार से संपर्क...

  • दिखावटी बदलाव काफी नहीं

    अग्निपथ योजना रिटायर्ड सैनिकों की पेंशन पर बढ़ते खर्च का बोझ घटाने के लिए केंद्र ने शुरू किया था। ओआरओपी योजना लागू होने के बाद से पेंशन खर्च में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। इस समस्या का हल क्या है? मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय सेना ने अग्निपथ योजना को बेहतर बनाने के कई सुझाव सरकार को भेजे हैं। सूत्रों के हवाले से ये खबर उस समय आई है, जब केंद्र में नई सरकार के गठन के दौरान ऐसी चर्चा गर्म थी कि भाजपा के कुछ सहयोगी दल इस योजना की समीक्षा चाहते हैं। अब इस खबर के जरिए...

  • लोकतंत्र है या कुलीनतंत्र?

    एडीआर के मुताबिक भाजपा के नए 240 लोकसभा सदस्यों की औसत संपत्ति 50.04 करोड़ रुपये है। एक बिजनेस अखबार के विश्लेषण से यह सामने आया है कि 54 प्रतिशत लोकसभा चुनाव क्षेत्रों में सबसे ज्यादा धनवान उम्मीदवार को जीत मिली। लोकसभा में इस बार कैसे जन प्रतिनिधि पहुंचे हैं, यह गौरतलब है। आखिर व्यक्ति की सोच और प्राथमिकताएं जिस वर्ग और पृष्ठभूमि से वह आता है, अक्सर उससे ही तय होती हैं। अति सुख-सुविधा में पले बढ़े व्यक्ति से यह अपेक्षा निराधार है कि वह वंचित लोगों की पीड़ा को ठीक-ठीक महसूस करेगा- खासकर उस स्थिति में अगर उसका समाज...

  • संदेह के गहरे बादल

    ऐसा पहली बार हुआ कि नीट-यूजी परीक्षा में बैठे 67 छात्रों ने पूरे अंक पा कर पहली रैंक हासिल की। ऑल इंडिया स्तर पर प्रथम रैंक अब तक एक या दो छात्रों को ही मिलती रही है। इसलिए संदेह गहरा गया है।  यह संदेह गहराता जा रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाएं धांधली का जरिया बन गई हैं और यह सब कुछ प्रशासन के संरक्षण में हो रहा है। अनेक राज्यों में पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं से यह शक बनना शुरू हुआ। अब देश के टॉप मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट-यूजी) को...

  • ये जो हकीकत है

    प्रधानमंत्री मोदी और सत्ताधारी पार्टी ने जमीनी हकीकत को ठेंगा दिखाते हुए नए शासनकाल में “निरंतरता” की राह चुनी है। उसी “निरंतरता” की, जो इस हकीकत को लगातार विकट बनाते जाने के लिए जिम्मेदार है। मगर यह एक जोखिम भरा रास्ता है। बीते फरवरी में- जब देश में आम चुनाव का माहौल बन रहा था- सरकार ने घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण से संबंधित आंशिक सूचनाएं जारी कर दीं। उनके जरिए यह धारणा बनाने की कोशिश की गई कि नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों से ऊपर से नीचे तक हर तबके का उपभोग बढ़ा है। बीते हफ्ते जब चुनाव नतीजे घोषित...

  • जोखिम भरी ये राह

    चार जून को नतीजे आने के बाद से भाजपा ने लगे झटके को नजरअंदाज करने और संख्या बल के आधार पर राजनीतिक पराजय की अनदेखी करने की जो रणनीति अपनाई, मंत्रि-परिषद के गठन में भी उसकी ही झलक देखने को मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई मंत्रि-परिषद यह संकेत देती है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रबंधकों ने आम चुनाव में लगे झटके के असर को फिलहाल मैनेज कर लिया है। ये अटकलें गलत साबित हुई हैं कि इस बार के मंत्रिमंडल में एनडीए के घटक दलों की प्रमुख उपस्थिति होगी। वैसे सहयोगी दलों के साथ भाजपा ने कुल...

  • यूरोपीय सियासत में भूचाल

    यूरोपीय संसद के चुनाव में दक्षिणपंथी और धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों को मिली जोरदार कामयाबी ने वहां की मध्यमार्गी व्यवस्था में एक तरह का भूकंप ला दिया है। फ्रांस में धुर दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली लगभग 32 फीसदी वोट लेकर पहले स्थान पर रही। इस झटके से हिले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संसद भंग कर नया चुनाव कराने का एलान तुरंत कर दिया। अब 30 जून को फ्रेंच संसद का चुनाव होगा। यूरोपीय निर्वाचन में मैक्रों की पार्टी को मेरी ली पेन की नेशनल रैली की तुलना में आधे वोट ही हासिल हुए। उधर जर्मन चांसलर ओलोफ शोल्ज की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी...

  • अब जाकर खुली आंख!

    यह अहसास तब हुआ, जब 2024 कॉरपोरेट्स की प्रिय पार्टी को तगड़ा झटका लगा और वह बहुमत से खासा दूर रह गई। तो अब उन्होंने सलाह दी है कि नई सरकार को रोजगार पैदा करने और महंगाई नियंत्रित करने पर ध्यान देना चाहिए। सर्वोच्च कॉरपोरेट अधिकारियों की आंख जाकर खुली है। उन्हें अंदाजा हुआ है कि भारत में बेरोजगारी एक दुर्दशा का रूप ले चुकी है। दूसरे अर्थों में यह कहा जा सकता है कि अपने बढ़ते मुनाफे से मस्त कॉरपोरेट सेक्टर को अब महसूस हुआ है कि जीडीपी की जिस ऊंची वृद्धि दर को लेकर उनकी खुशफहमी आसमान में...

  • मुनाफे का नया सेक्टर

    डॉक्टरों के बिल और बीमा प्रीमियम में तेज बढ़ोतरी के कारण मुनाफे की संभावना बढ़ती जा रही है। इसके अलावा लाइफस्टाइल रोग तेजी से फैल रहे हैं। इन सबसे इलाज के कारोबार में  मुनाफा बढ़ने की संभावना मजबूत होती जा रही है। भारत के अस्पताल और दवा कंपनियों में विदेशी इक्विटी फंड और वेंचर कैपिटलिस्ट बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ा रहे हैं। कारण यह बताया गया है कि देश में डॉक्टरों के बिल और बीमा प्रीमियम में तेज बढ़ोतरी के कारण मुनाफे की संभावना बढ़ती जा रही है। इसके अलावा लाइफस्टाइल रोग तेजी से फैल रहे हैं। इससे भी मुनाफा...

  • अब वैसा भरोसा नहीं!

    पश्चिमी मीडिया के मुताबिक अमेरिका की सामरिक रणनीति के तकाजों को पूरा करने की मोदी की क्षमता को लेकर अब वहां भरोसा घटेगा। मतलब, बाजार हो या पश्चिमी राजधानियां- मोदी को वहां उतार पर पहुंच चुके नेता के रूप में देखा जाने लगा है। लोकसभा चुनाव के नतीजों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुतबे पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, अब वह कई रूपों में जाहिर होने लगा है। मोदी की खास ताकत वित्तीय बाजारों और पश्चिमी राजधानियों में उनकी ऊंची साख रही है। यह साख इस यकीन से बनी कि मोदी संबंधित नीतियों पर प्रभावी अमल कर सकने में...

  • मोल-भाव अभी बाकी है

    अगली सरकार चूंकि वास्तविक अर्थ में गठबंधन सरकार होगी, इसलिए सहयोगी दलों की मांगों और महत्त्वाकांक्षाओं को इस बार भाजपा नेतृत्व को पूरा करना ही होगा। इसके लिए मोल-भाव की खबरें अभी से गर्म हैं, जिनका ज्यादा गहरा असर आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने को आतुर नरेंद्र मोदी ने असाधारण फुर्ती दिखाई। चुनाव नतीजे घोषित होने के अगले ही दिन उन्होंने भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन- एनडीए के घटक दलों की बैठक बुला ही। उसी बैठक में उन्होंने सभी दलों से समर्थन का पत्र भी हासिल कर लिया। स्पष्टतः इस तेजी का मकसद इस...

  • विकल्प पर बात हो

    चुनौती यह है कि जिन कारणों से लोग बेचैन हैं, उन्हें दूर की ठोस योजना पर विचार किया जाए? उन गंभीर मुद्दों पर विपक्षी दलों को जुमलाबाजी और बिना ठोस योजना के गारंटी घोषित करने के मोह से बचना चाहिए। आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जो झटका लगा, उस बारे में सियासी हलकों में यह आम राय है कि व्यापक बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई इसका प्रमुख कारण हैं। अपने सामने अवसरों का अभाव देख रहे लोगों- खासकर नौजवानों ने अनेक राज्यों में सत्ताधारी पार्टी को सबक सिखाने के मकसद से मतदान किया। यह अच्छी बात है कि इस...

  • शेयर मार्केट का ड्रामा

    भाजपा की सफलता- विफलता से शेयर बाजारों का रुख क्यों जुड़ा हुआ है? भाजपा को झटका लगा, तो उससे शेयर बाजार क्यों परेशान हुए? क्या यह सोच कर कि गठबंधन की मजबूरियों में अगली सरकार को सामाजिक क्षेत्र पर खर्च बढ़ाना होगा? इस हफ्ते शेयर बाजारों में नाटकीय घटनाएं हुई हैं। शनिवार को एग्जिट पोल घोषित हुए, तो शेयर बाजार के कर्ता-धर्ता बल्लियों उछल गए। तो सोमवार को बाजार खुलते ही शेयरों के भाव भी उछलते चले गए। अगले दिन जब मतगणना हुई, तो शेयर बाजार का सामना हकीकत से हुआ। भाजपा को परिकथा जैसी सफलता मिलने के बजाय पार्टी...

  • मोदी के लिए मुश्किल

    एनडीए अगर एकजुट रहा, तो भी सहयोगी दलों के तेवर गुजरे दस वर्षों जैसे नहीं रहेंगे। ऐसे में गठबंधन और सरकार का नेतृत्व करना एक नए तरह के कौशल की मांग करेगा। नरेंद्र मोदी ऐसे कौशल के लिए नहीं जाने जाते। दो राज्यों- उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्त्वाकांक्षाओं और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे पर तगड़ा प्रहार किया। इनके अलावा कई और राज्यों ने पार्टी के वर्चस्व में सेंध लगाई। इनमें हरियाणा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, झारखंड एवं कुछ अन्य राज्यों का जिक्र किया जा सकता है। भाजपा को ओडिशा, तेलंगाना, और यहां तक...

  • सच बोलने की चुनौती

    अब आवश्यकता देश की बहुसंख्यक जनता की वास्तविक स्थिति पर सार्वजनिक बहस की है, ताकि एक खुशहाल समाज बनाने की तरफ बढ़ा जा सके। वरना, वे हालात और गंभीर होंगे, जिनकी एक झलक चुनाव अभियान के दौरान देखने को मिली है। पिछले दस साल में भारत के लोगों की बढ़ी मुसीबत का प्रमुख कारण उनसे बोला गया झूठ या अर्धसत्य है। खासकर ऐसा आर्थिक मामलों में हुआ है। आर्थिक आंकड़ों को उनके पूरे संदर्भ में पेश करने के बजाय उनके भीतर से चमकती सूचनाओं को चुन कर इस तरह बताया गया है, मानों सबकी जिंदगी बेहतर हो रही हो। अभी...

  • ऐसा अविश्वास नहीं देखा

    बने हालात के मद्देनजर सवाल उठा है कि क्या आज घोषित होने वाले चुनाव परिणाम को समाज के हर हलके में पूरे यकीन के साथ सहजता से स्वीकार किया जाएगा? विचारणीय यह है कि देश में राजनीतिक अविश्वास का ऐसा माहौल क्यों बना है? लोकसभा चुनाव के आज जाहिर होने वाले परिणाम चाहे जो हों, लेकिन जिस माहौल में ये नतीजे घोषित हो रहे हैं, भारतीय लोकतंत्र के लिए वह गहरी चिंता का कारण है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह अविश्वास की खाई बढ़ी है, उसे देखते हुए आने वाले दिनों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सुचारू अमल...

  • कंपनियों का ‘वेल्थ क्रिएशन’

    क्या लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच कॉरपोरेट सेक्टर ने अपना पक्ष चुन रखा है, जिसे सत्ता में बनाए रखने के लिए वह अपना पुरजोर दम लगाती हैं? यह सच है तो, अन्य दलों के लिए बनने वाली प्रतिकूल स्थितियों का अनुमान सहज ही लग सकता है। लोकसभा चुनाव के लिए मतदान का आखिरी चरण पूरा होते ही एनएचएआई ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगने वाले टॉल टैक्स में पांच प्रतिशत वृद्धि कर दी। उधर सहकारी कंपनी अमूल ने दूध के दाम दो रुपये लीटर बढ़ा दिए। वित्तीय अखबार कुछ से ऐसी खबरें छाप रहे हैं कि एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी चुनाव...

  • दक्षिण अफ्रीका में बदलाव

    एएनसी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक यात्राओं में काफी समानता है। क्या एएनसी नई चुनौतियों से उबरने में कामयाब होगी? या धीरे-धीरे दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में उसकी स्थिति वैसी ही हो जाएगी, जैसी भारत में इंडियन नेशनल कांग्रेस की हुई? दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी शासन खत्म होने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब सत्ताधारी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एनएसी) के पास बहुमत नहीं होगा। अब उसे अपना राष्ट्रपति चुनवाने के लिए किसी सहयोगी दल की जरूरत पड़ेगी। (दक्षिण अफ्रीका में कार्यकारी शक्ति राष्ट्रपति के हाथ में होती है, जिनका चुनाव संसद करती है।) रंगभेद की समाप्ति के...

  • नतीजों का इंतजार बेहतर

    विपक्ष में मेनस्ट्रीम मीडिया पर सत्ता पक्ष के नियंत्रण की शिकायतें काफी गहरा चुकी हैं। इसलिए उनमें एग्जिट पोल्स पर अविश्वास को एक सहज प्रतिक्रिया माना जाएगा। दरअसल, ऐसे सर्वेक्षणों को लेकर ऐसी ही प्रतिक्रिया सिविल सोसायटी के अंदर भी है। लोकसभा के आम चुनाव के लिए मतदान पूरा हो चुका है। विभिन्न टीवी चैनलों और कुछ अखबारों के एग्जिट पोल अनुमानों के मुताबिक देश में कमोबेस राजनीतिक यथास्थिति बनी रहेगी। मगर इन अनुमानों के बीच आपसी फर्क इतना अधिक है कि उसके आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना बेमायने है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को...

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