वाडा और एआईयू जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों से भारत में इस समस्या के लगातार गहराने की पुष्टि हुई है, लेकिन खेल संस्थाओं या सरकार ने इस दिशा में कोई सख्त एवं प्रभावी पहल नहीं की है।
स्कॉटलैंड के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले ही दिन जुडो खिलाड़ी अरुण कुमार को डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने के कारण इस आयोजन से बाहर कर दिया गया। इसके पहले कई अन्य भारतीय खिलाड़ियों को भी इसी टेस्ट में फेल होने के कारण इन खेलों में भाग लेने से रोक दिया गया था। खेलों की दुनिया में भारत के लिए यह नई शर्मनाक स्थिति है। हालिया वर्षों से विश्व एंटी-डोपिंग एजेंसी- वाडा- की रिपोर्ट में भारत दुनिया में डोपिंग उल्लंघन करने वाले देशों की सूची में लगातार शीर्ष पर बना हुआ है। एथलेटिक्स, वेटलिफ्टिंग, और कुश्ती में इसके सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। दरअसल, कई एथलीटों के डोप टेस्ट में विफल होने के कारण ग्लासगो गेम्स में भारत के वेटलिफ्टिंग कोटा में कटौती कर दी गई।
हाल में डोपिंग के मामले क्रिकेट, फुटबॉल और बॉक्सिंग जैसे खेलों में भी सामने आए हैं। नतीजतन, एथलेटिक्स इंटीग्रिटी यूनिट (एआईयू) ने भारत को उच्च-जोखिम वाली श्रेणी में डाल दिया है। एआईयू के इस निर्णय से खेल जगत में भारत की साख कमजोर हुई है। इसका नतीजा यह होगा कि अब अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारतीय एथलीटों को अधिक सख्त और अतिरिक्त परीक्षणों से गुजरना होगा। बड़े खेल आयोजनों से पहले भारतीय खिलाड़ी डोप टेस्ट में फेल होते रहे, तो अंतरराष्ट्रीय खेल संघ भारत के कोटा (प्रतिनिधित्व के लिए खिलाड़ियों की संख्या) में कटौती कर सकते हैं।
यह आशंका भी है कि अन्य देश और प्रायोजक भारतीय एथलीटों की उपलब्धियों को संदेह की नजर से देखने लगें। मगर इन अंदेशों से भारतीय खेल प्रशासक बेपरवाह नजर आते हैँ। वाडा और एआईयू जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों से देश में इस समस्या के लगातार गहराने की पुष्टि होती रही है, लेकिन खेल संस्थाओं या भारत सरकार ने इस दिशा में कोई सख्त एवं प्रभावी पहल नहीं की है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस समय भारत सरकार ने ओलिंपिक में अधिक मेडल जीतने की कथित योजनाओं और 2036 ओलंपिक की मेजबानी हासिल करने जैसी महत्त्वाकांक्षी बातों में देशवासियों को उलझाए रखा है, उसी समय खेल की जड़ों को डोपिंग का घुन कुतरता जा रहा है।
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