कहानी पर भारी तमाशा: ‘वेलकम टू द जंगल’
फ़िल्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह लगातार हंसाने की कोशिश करती है, लेकिन अपने पात्रों को जीने का अवसर ही नहीं देती।…जबकि अच्छी कॉमेडी ठहराव से पैदा होती है। चार्ली चैप्लिन की मुस्कान, ऋषिकेश मुखर्जी की सहजता, बासु चटर्जी का घरेलूपन या प्रियदर्शन की अफरा-तफरी, इन सबमें एक समानता थी। वहां हंसी इंसान से निकलती थी। परिस्थिति बाद में आती थी। ‘वेलकम टू द जंगल’ में परिस्थिति पहले आती है, इंसान बाद में। सिने-सोहबत हर दौर की कॉमेडी अपने समय का आईना होती है। एक समय था जब हमें हंसाने के लिए बड़े पर्दे पर मशहूर हास्य...