नई दिल्ली। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के 10वें दिन कच्चे तेल की कीमत एक सौ डॉलर की सीमा पार कर गई। पूरी दुनिया के तेल को लेकर हाहाकार मचा है। पिछले 10 दिन में कच्चे तेल की कीमत में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कच्चे तेल की कीमत पिछले साढ़े तीन साल में सबसे ज्यादा पहुंच गई है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई थी। जी7 देशों और यूरोपीय संघ दोनों ने इस पर चिंता जताई है।
इससे पहले कच्चे तेल की कीमत रविवार को एक सौ डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई थी, जो सोमवार को 115 डॉलर की सीमा तक पहुंची। इससे पहले 2022 में रूस और यूक्रेन युद्ध की वजह से कच्चा तेल एक सौ डॉलर के पार निकला था। दुनिया भर के देशों और बहुपक्षीय मचों पर इसे लेकर चिंता जताई गई है। तेल की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा संकट के बीच दुनिया के सबसे अमीर सात देशों के समूह जी 7 देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक प्रस्तावित है, जिसमें आपातकालीन तेल भंडार जारी करने के प्रस्ताव पर चर्चा होगी। ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की एक रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गई।
अखबार की रिपोर्ट में कहा गया है कि जी7 देशों की योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के साथ तालमेल करके आपात भंडार से तेल बाजार में जारी किया जा सकता है, ताकि कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका सहित जी7 के कई देश इसके समर्थन में हैं। जानकारों का मानना है कि अगर आपात भंडार से तेल जारी किया जाता है तो इससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
इस बीच तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर यूरोपीय आयोग ने कहा है कि यूरोपीय यूनियन के तेल और गैस सप्लाई से जुड़े कॉर्डिनेशन ग्रुप की इस हफ्ते गुरुवार को बैठक होगी। इस बैठक में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष की वजह से ऊर्जा बाजार पर होने वाले असर और यूरोपीय संघ के देशों के ऑयल स्टोरेज के हालात पर चर्चा की जाएगी। कहा गया है कि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने पास कम से कम 90 दिनों की जरूरत के बराबर ऑयल स्टोरेज रखें। ईरान युद्ध के बीच बढ़ती ऊर्जा कीमतों को लेकर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि तेल और गैस की कीमतों में तेजी जर्मन अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है।
इस बीच बहरीन की सरकारी तेल कंपनी बापको एनर्जीज ने अपनी एक्टविटीज पर फोर्स मेज्योर घोषित किया है। इसका मतलब है कि अगर किसी वजह से तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कंपनी उसकी जिम्मेदार नहीं मानी जाएगी क्योंकि हालात उसके कंट्रोल से बाहर हैं। गौरतलब है कि ईरान लगातार बहरीन पर हमला कर रहा है। पश्चिम एशिया दसवें दिन भी जंग जारी रहने का असर एशियाई शेयर बाजारों पर भी देखने को मिला। सभी एशियाई देशों में भारी गिरावट देखी गई।


