राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ यानी आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ में लिखा गया है कि 2004 में केंद्र में यूपीए सरकार के समय सोनिया गांधी ने जो नेशनल एडवाइजरी कौंसिल यानी एनएसी बनाई थी उसमें दिमागी नक्सल भरे हुए थे। प्रफुल्ल केतकर ने ‘ऑर्गेनाइजर’ में यह टिप्पणी लिखी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से दिमागी नक्सल का जो जुमला बोला था उस समय ही यह आशंका जताई गई थी कि इसका मिसयूज हो सकता है। इस लेख से यह आशंका प्रमाणित होती है। सोनिया गांधी की एनएसी में शामिल लोगों से वैचारिक मतभेद हो सकते हैं या उनकी सिफारिश पर बनी नीतियों से भी मतभेद हो सकते हैं लेकिन क्या उनको दिमागी नक्सल कहा जा सकता है?
यह भी सवाल है कि अगर वे दिमागी नक्सल थे तो सरकार उनकी सिफारिश पर बनी नीतियों को खत्म क्यों नहीं कर देती है? उनकी सिफारिश पर अधिकार आधारित कई योजनाएं शुरू हुई थीं, जो आज भी चल रही हैं। बहरहाल, सोनिया गांधी की एनएसी में पूर्व आईएएस अरुणा रॉय और एनसी सक्सेना सदस्य थे। क्या इनको दिमागी नक्सल कहा जाएगा? योजना आय़ोग में रह चुके नरेंद्र जाधव और मिहिर शाह सदस्य थे। जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और एके शिवकुमार इसके सदस्य थे। फऱाह नकवी और अनु आगा भी सदस्य थे। इनमें किसको और किस आधार पर दिमागी नक्सल कहा जा सकता है? क्या ये लोग देश के दलित, पिछड़ों, आदिवासियों के हित की बात करते थे या उद्योगपतियों की लूट से जल, जंगल, जमीन बचाने की बात करते थे इसलिए ये दिमागी नक्सल थे?
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