आज़ादी की कहानियों को दास्तानगोई में मिला है नया पता
कभी तिलिस्मी क़िस्सों के लिए जानी जाने वाली दास्तानगोई की कला जब दोबारा ज़िंदा हुई तो उसमें फिल्मी हस्तियों, उर्दू-हिंदी साहित्यकारों की कहानी, पौराणिक कहानियां, लोक कथाएं वगैरह जुड़े। मगर हिंदुस्तान क्या केवल इन्हीं कहानियों से मिलकर बना है? नहीं! देश की मिट्टी में आज़ादी के परवानों का लहू भी है, और डॉ. हिमांशु बाजपेयी व डॉ. प्रज्ञा शर्मा स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी कहानियों को अपनी दास्तानों में पिरो रहे हैं। कहानियां इस देश की रग-रग में हैं, कोई भूली बात हो या नसीहत, लोग अपनी बात किसी न किसी क़िस्से से ही पूरी करते हैं। ऐसे में क्या हैरानी...