कभी तिलिस्मी क़िस्सों के लिए जानी जाने वाली दास्तानगोई की कला जब दोबारा ज़िंदा हुई तो उसमें फिल्मी हस्तियों, उर्दू-हिंदी साहित्यकारों की कहानी, पौराणिक कहानियां, लोक कथाएं वगैरह जुड़े। मगर हिंदुस्तान क्या केवल इन्हीं कहानियों से मिलकर बना है? नहीं! देश की मिट्टी में आज़ादी के परवानों का लहू भी है, और डॉ. हिमांशु बाजपेयी व डॉ. प्रज्ञा शर्मा स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी कहानियों को अपनी दास्तानों में पिरो रहे हैं।
कहानियां इस देश की रग-रग में हैं, कोई भूली बात हो या नसीहत, लोग अपनी बात किसी न किसी क़िस्से से ही पूरी करते हैं। ऐसे में क्या हैरानी की बात है कि दास्तानगोई की कला फिर से जीवित हो रही है। यह कला जो कभी तिलिस्मी क़िस्सों के लिए जानी जाती थी जब दोबारा ज़िंदा हुई तो उसमें कई आधुनिक विषय जुड़े। जैसे फिल्मी हस्तियां, उर्दू-हिंदी साहित्यकार, पौराणिक कहानियां, लोक कथाएं वगैरह वगैरह। लेकिन हिंदुस्तान क्या केवल इन्हीं कहानियों से मिलकर बना है?
नहीं। जवाब देते हैं दास्तानगोई की दुनिया का चिर परिचित नाम डॉ. हिमांशु बाजपेयी। लखनऊ के रहने वाले डॉ. हिमांशु की इस कला को लोगों के बीच पहुंचा रहे कलाकारों में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उनकी पहचान में उनके पत्रकारिता के काम और ‘किस्सा किस्सा लखनऊवा’ का लेखक होना भी शामिल है।
लेकिन दास्तानगोई के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान है- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर सुनाई जा रहीं उनकी अनेक दास्तानें। इस मिशन में बराबरी से उनका साथ दे रही हैं देश की प्रमुख महिला दास्तानगोयों में से एक डॉ. प्रज्ञा शर्मा।
पिछले कई सालों से ये दोनों देश-विदेश में तहरीक-ए-आज़ादी से जुड़ी विभिन्न कहानियों को दास्तानगोई शैली में सुना रहे हैं। इनमें काकोरी एक्शन 1925, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, वाजिद अली शाह, बेगम हज़रत महल, सुभाष चंद्र बोस, जलियांवाला बाग़ हत्याकांड, गिरमिटिया मज़दूर, बिरसा मुंडा, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू आदि विषयों पर दास्तानें बहुत मशहूर हुई हैं।
राष्ट्रीय आंदोलन को दास्तानगोई का विषय बनाने के बारे में हिमांशु बाजपेयी कहते हैं, ‘देश की आज़ादी की कहानी लोगों के बीच में रची-बसी रहे, उनके दिल के क़रीब रहे, ये उनके लिए दूर-दूर की कोई बात भर न हो, इसलिए हम जैसे क़िस्सागो ये कहानियां सुनाते हैं। क़ौल मशहूर है कि हम अपने क्षणों का वास्तविक मूल्य तब तक नहीं जानते जब तक वो स्मृति की परीक्षा से नहीं गुजर जाते।
एक राष्ट्र की राष्ट्रीय स्मृति को संजोए रखने में किस्सागोयों का अहम योगदान होता है। ये स्मृतियां ही एक राष्ट्र को प्रेरणा देती हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने बुंदेलखंड के हरबोलों से झांसी की रानी की कथा सुनी और फिर एक कालजयी कविता हिंदी साहित्य को मिली। भगत सिंह ने किरती मैगज़ीन में विद्रोही छद्मनाम से काकोरी एक्शन के क्रातिकारियों की मार्मिक जीवन-कथा लिखी ताकि पढ़ने वाले राष्ट्रीय भावना के सूत्र में बंध सकें।’
हिमांशु और प्रज्ञा के ज़ख़ीरे में अलग-अलग विषयों पर 45 से अधिक दास्तानें हैं। इनमें से 15 दास्तानें सिर्फ आज़ादी की लड़ाई पर आधारित हैं। कई दास्तानों की 100 से अधिक प्रस्तुतियां हो चुकी हैं। दोनों कलाकार इन्हें प्रतिष्ठित साहित्यिक सांस्कृतिक उत्सवों में सुना रहे हैं। गांव-शहर के छोटे बड़े स्कूलों में भी प्रस्तुत कर रहे हैं; ताकि नई पीढ़ी स्वतंत्रता संघर्ष के महत्त्व को जान सके।
प्रज्ञा कहती हैं, ‘राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास पढ़ने पर रोंगटे खड़े कर देने वाले किस्से मिलते हैं। बच्चों का इन्हें जानना बहुत ज़रूरी है। बचपन का असर व्यक्तित्व पर पूरी ज़िंदगी रहता है। इसलिए स्कूलों में दास्तान सुनाने का कोई मौक़ा हम नहीं छोड़ते।’
राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी हिमांशु की पहली प्रस्तुति ‘दास्तान-ए-तमन्ना-ए-सरफरोशी’ जो 9 अगस्त 1925 के काकोरी एक्शन पर आधारित थी। हिमांशु ने बताया कि इस दास्तान को तैयार करने में उन्होंने तीन साल का गहन शोध किया था। इसी दास्तान के लिए उन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में सम्मानित भी किया था।
इस दास्तान के बनने की कहानी सुनाते हुए हिमांशु बताते हैं, ‘जब मैं पत्रकार था तब मैने काकोरी शहीद स्मारक की उपेक्षा पर एक रिपोर्ट लिखी थी। मगर उस दिन ये एहसास दिल में हमेशा के लिए बस गया था कि काश कुछ और कर पाता इस विषय पर। फिर कई सालों बाद जब मैं दास्तानगोई करने लगा तो मुझे लगा कि अब इस मीडियम में काकोरी की कथा को बेहतर ढंग से कहा जा सकता है। किसी ने कहा है कहानियां सुनाना उन चीज़ों को संजोकर रखने का सबसे हसीन तरीका हैं जिन चीज़ों से आप प्यार करते हैं, जो आप खुद हैं, और जिन्हें आप कभी खोना नहीं चाहते।’
दास्तानगोई के सफर में प्रज्ञा शर्मा जुड़ीं झांसी की रानी की दास्तान से। इस दास्तान के विषय में प्रज्ञा बताती हैं, ‘मैं पहले रिसर्च के काम में हिमांशु की मदद करती थी, ख़ासतौर पर अंग्रेज़ी किताबें पढ़ने में। फिर जब इस दास्तान की बात आई तो हिमांशु ने मुझसे कहा कि झांसी की रानी दास्तान में एक फीमेल वॉइस तो होनी ही चाहिए। तुम करोगी दास्तान? अकेले हम सुनाएंगे तो बात नहीं बनेगी। मैं उनके साथ जुड़ी, खूब रिहर्सल की और दास्तान सुनाई। लोगों ने बहुत पसंद की। फिर यहां से एक के बाद एक दास्तानें आने लगीं।’
लोकगायक पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया राष्ट्रीय आंदोलन पर आधारित दास्तानों के बड़े प्रशंसक हैं। टिपानिया कहते हैं, ‘हिमांशु और प्रज्ञा ने देश प्रेम से भरी अनेक दास्तान सुनाई हैं। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, बिरसा मुंडा आदि।। ये कलाकार जो भी दास्तान सुनाते हैं उनमें दो सबसे बड़ी ख़ूबियां होती हैं- शोध बहुत गहरा होता है और शब्दों से ऐसा खाका खींचा जाता है कि सुनने वालों के मन में अंग्रेज़ों के ज़माने के चित्र चलने लगते हैं।’ (साभार- दवायर)
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



