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बग़ावत की एक गेंद: ‘दूसरा’

तारा की कहानी भारतीय समाज के दोहरे पैमाने पर चोट करती है। पुरुष की बग़ावत को आत्मविश्वास और स्त्री की स्वतंत्रता को परिवार की इज़्ज़त के लिए ख़तरा समझने वाली मानसिकता आज भी मौजूद है। इस लिहाज़ से ‘दूसरा’ एक ज़रूरी विषय उठाती है।… समाज की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह मैदान में बग़ावत करने वाले नायक को कितनी तालियां देता है, बल्कि इस बात से होती है कि अपने ही घर में उठती बग़ावत को कितनी जगह देता है।

सिने-सोहबत

13 जुलाई 2002। लॉर्ड्स की बालकनी में सौरव गांगुली अपनी शर्ट लहरा रहे थे। भारत ने नेटवेस्ट फ़ाइनल जीत लिया था। वह सिर्फ़ क्रिकेट का जश्न नहीं था; वह अपनी शर्तों पर जीतने का ऐलान था। मैदान पर बग़ावत करने वाले नायक को तालियां मिलती हैं लेकिन घर की चारदीवारी में अपनी पहचान के लिए लड़ती लड़की को अक्सर सवालों और सज़ाओं का सामना करना पड़ता है। अभिनय देव की फ़िल्म ‘दूसरा’ इसी विरोधाभास को राजस्थान के एक छोटे शहर में पली-बढ़ी तारा की कहानी से जोड़ती है। सौरव गांगुली का ऐतिहासिक जश्न उसके लिए अपनी आवाज़ पहचानने की प्रेरणा बनता है।

विचार मौलिक है। स्क्रिप्ट और डायरेक्शन असरदार। सिनेमा लाजवाब।

तारा राजस्थान के एक सामंती परिवार में बड़ी होती है, जहां सवाल पूछना गुनाह है और असहमति का जवाब अक्सर थप्पड़। उसके लिए जीवन का रास्ता पहले ही तय कर दिया गया है। मुश्किल यह है कि उसके भीतर की दुनिया उस रास्ते से मेल नहीं खाती। लड़कियों के प्रति उसका आकर्षण उसकी पहचान का हिस्सा है, लेकिन घर में इसे सहजता से स्वीकार किए जाने की उम्मीद नहीं।

ऐसे में उसकी दोस्ती महज़ एक सहायक रिश्ता नहीं, उसकी ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी पनाह बन जाती है। दोस्त के सामने तारा को अपनी भावनाओं का बचाव नहीं करना पड़ता। वह अपनी उलझनें कह सकती है, अपनी इच्छाओं को पहचान सकती है और कुछ पल के लिए उस लड़की की तरह जी सकती है, जिसे परिवार ने जीने की इजाज़त नहीं दी।

इस दोस्ती की ख़ूबसूरती किसी बड़े भाषण में नहीं, उस सहजता में है जहां स्वीकार किया जाना किसी अहसान की तरह महसूस नहीं होता। लेकिन दोस्त के साथ सुरक्षित होना और अपने घर में सच के साथ खड़े होना दो अलग बातें हैं। तारा का संघर्ष तब गहरा होता है, जब उसे अपनी पहचान और अपने परिवार के बीच चुनाव करने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। उसका पारम्परिक विवाह भी इस भीतर के सच को मिटा नहीं पाता।

तारा की कहानी का भावनात्मक केंद्र यही है: वह केवल बंधनों से भागना नहीं चाहती; वह चाहती है कि अपने घर में भी उसे छिपकर न जीना पड़े।

सौरव गांगुली का लॉर्ड्स में भारत की शानदार जीत के बाद शर्ट लहराना तारा के लिए प्रतिरोध का प्रतीक बनता है। वह अपने पिता के सामने, परिवार के दूसरे सदस्यों की मौजूदगी में, अपनी बात कहने का साहस जुटाती है। एक सार्वजनिक जीत का दृश्य उसकी निजी बग़ावत को आवाज़ देता है।

यहां फ़िल्म का मेटाफ़र काम भी करता है और जोखिम भी उठाता है। क्रिकेट का मैच समाप्त हो जाता है; पहचान के लिए संघर्ष का कोई फ़ाइनल नहीं होता। गांगुली के जश्न को देश ने जीत की तरह देखा, जबकि तारा की बग़ावत उसके रिश्तों और भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

दोनों के बीच समानता साहस की है, परिस्थितियों की नहीं। फ़िल्म को यह साफ़ साफ़ दिखाना था कि गांगुली से मिली प्रेरणा तारा के भीतर कैसे उतरती है। तारा बचपन से सौरव गांगुली के तेवर, स्वैग, साहस और खेल की मुरीद रही थी। वो गांगुली के सफ़र को काफ़ी क़रीब से फॉलो कर रही थी और इससे उसे काफ़ी प्रेरणा मिलती थी। सवाल करते रहने की हिम्मत मिलती थी।

तारा की कहानी भारतीय समाज के दोहरे पैमाने पर चोट करती है। पुरुष की बग़ावत को आत्मविश्वास और स्त्री की स्वतंत्रता को परिवार की इज़्ज़त के लिए ख़तरा समझने वाली मानसिकता आज भी मौजूद है। इस लिहाज़ से ‘दूसरा’ एक ज़रूरी विषय उठाती है।

लेकिन ज़रूरी विषय अपने आप में अच्छी फ़िल्म नहीं बनाता। यही वह कसौटी है जिस पर इस विचार को परखना चाहिए। क्या तारा एक जीवित, विरोधाभासों से भरी इंसान बनती है, या सामाजिक संदेश का माध्यम भर रह जाती है? क्या उसके परिवार के किरदार अपनी जटिलता के साथ सामने आते हैं, या केवल रूढ़िवाद के प्रतिनिधि बनकर रह जाते हैं? और क्या क्रिकेट की समानांतर कहानी तारा के संघर्ष को गहरा करती है, या उसकी भावनात्मक जगह घेर लेती है? ये महज़ तकनीकी सवाल नहीं हैं। किसी फ़िल्म में दर्शक पहले पात्रों के साथ जीता है, उसके बाद उसके विचार से जुड़ता है। पटकथा अगर भावनाओं को केवल समझाती रहे, तो वह दर्शक को महसूस करने का अवसर नहीं देती। इन सभी सवालों के सटीक जवाबों के लिए भी ये फ़िल्म देखी जा सकती है।

तारा की भूमिका में प्लाबिता बोरठाकुर के सामने उसकी भीतरी दुनिया को विश्वसनीय बनाने की चुनौती है। अंकुर विकल पिता की भूमिका में हैं और ट्विशा जोशी युवा तारा के रूप में दिखाई देती हैं। अन्य प्रमुख कलाकारों में कृष्णा गोकानी, समिधा गुरु, राजीव अंकित, मोक्स राठौड़ और नवीन रतावा शामिल हैं।

फ़िल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले एग्नेलो डायस के हैं। लेखन टीम में मैट ग्राहम, माशा सजदेह, रोहन सजदेह और ज़ैक शेख़ शामिल हैं। निर्माता माशा सजदेह, स्टीवन कैंटर, जेमी शुट्ज़ और रोहन सजदेह हैं। राम संपत ने संगीत दिया है। फ़िल्म रमेश देव प्रोडक्शन के बैनर तले बनी है।

खेल की कलेक्टिव मेमोरी को एक लड़की की निजी पहचान के संघर्ष से जोड़ना हिंदी सिनेमा में कम इस्तेमाल हुई सम्भावना है। इस जोखिम को उठाने के लिए फ़िल्म के निर्माताओं और निर्देशक अभिनय देव को बधाई दी जानी चाहिए। नई राह चुनना और उस पर प्रभावशाली सिनेमा रच पाना असाधारण उपलब्धियां हैं, जिसमे अभिनय बिलकुल खरा उतरते हैं। अंततः फ़िल्म की सफलता सिर्फ़ उसके विचार से नहीं, उस विचार को पर्दे पर जीवित करने की क्षमता से भी तय होती है जिसमें फिल्मकार ने वैसा ही प्रदर्शन किया है जैसा महान क्रिकेटर सौरव गांगुली ने भारतीय टीम को एक नया तेवर देकर उनके दिलों में देश के लिए जीत हासिल करने का जज़्बा भरकर किया था।

क्रिकेट में ‘दूसरा’ वह गेंद है, जो बल्लेबाज़ की उम्मीद के विपरीत दिशा लेती है। तारा के लिए भी दूसरा रास्ता उस जीवन से अलग है, जो उसके लिए पहले से तय कर दिया गया है। लॉर्ड्स की बालकनी में गांगुली की शर्ट जीत का उत्सव थी। तारा की बग़ावत अपने सच के साथ जीने की कोशिश है।

समाज की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह मैदान में बग़ावत करने वाले नायक को कितनी तालियां देता है, बल्कि इस बात से होती है कि अपने ही घर में उठती बग़ावत को कितनी जगह देता है।

नज़दीकी सिनेमाघरों में लगी है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

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