इतिहास राख में ही लोटपोट रहता है!
दुनिया हमेशा धुएँ की हल्की-सी गंध में जीती आई है, कुछ स्मृति से उठती, कुछ स्थाई या घटना विशेष से जलती हुई। यदि इतिहास से उसका रोमांच निकाल दे, तो जो बचता है वह बस मलबा है विरासत के वस्त्रों में सजा हुआ। ट्रॉय की राख, यूरोप की खाइयाँ, हिरोशिमा की चमक, काबुल की धूल। हर सदी शांति के प्रवचन से शुरू हुई। पर खत्म विनाश पर हुई। हथियार बदले हैं, तलवारें अब ड्रोन हैं, उपनिवेश अब “क्लाइंट स्टेट”, जबकि प्रवृत्ति वही है: वर्चस्व की, जिसे नियति के नाम पर पेश किया जाता है। चारों ओर देखिए। दुनिया फिर घावव...