आओ, मनुस्मृति जलाएं!
हिन्दू ग्रंथों की निन्दा करने वाले उसे शायद ही पढ़ते हैं। मनुस्मृति के राज्य-शासन संबंधी तीनों अध्याय गंभीर ज्ञान-भंडार हैं। अधिकांश आज भी मूल्यवान। तब सोचें, तीन हजार वर्ष पहले इतना गहन चिंतन विश्व में कहाँ था! तब यहाँ ऐसे शास्त्र रचे गए, जिन की बातें आज भी चमत्कृत करती है। ... निंदक लोग केवल सुनी-सुनाई पर चलते हैं कि उस में 'शूद्रों या स्त्रियों के बारे में कुछ आपत्तिजनक है।’ वस्तुतः मनुस्मृति में वैसा भी कुछ नहीं है।.. स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मनुस्मृति को अपने समाज-सुधार का आधार बनाया था। यदि मनुस्मृति जातिवादी या स्त्री-विरोधी होती, तो वे संपूर्ण भारत...