बढ़ाए सामाजिक विकास पर खर्च

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपने तीसरे बजट की तैयारी कर रही हैं। इस बार का उनका बजट कोरोना वायरस की महामारी की छाया में बन रहा है। उन्होंने बनने से पहले ही अपने इस बजट को ऐतिहासिक बताया है।

इस साल नहीं छपेगा बजट दस्तावेज

कोरोना वायरस की महामारी का असर सिर्फ संसद के सत्र पर ही नहीं है, बल्कि बजट के दस्तावेजों पर भी है। वायरस की वजह से वित्त वर्ष 2020-21 के बजट दस्तावेज नहीं छापे जाएंगे

ऐतिहासिक बजट कैसा होगा?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और दूसरा बजट तैयार कर रही हैं। उनके पहले बजट ही हाईलाइट यह थी कि चमड़े के ब्रीफकेस की बजाय वे झोले में बजट लेकर संसद पहुंची थीं।

सरकारी खर्च बढ़ेगा या नहीं?

केंद्र सरकार के बजट को लेकर समाज के हर तबके की अपनी उम्मीद होती है। हालांकि पिछले कुछ समय से सरकार के ज्यादातर आर्थिक फैसले बजट से बाहर होते हैं इसलिए अब बजट को लेकर ज्यादा दिलचस्पी नहीं रहती है।

सरकार कैसी आर्थिकी बनाना चाहती है?

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने एक कार्यक्रम में कहा कि भारत में बहुत ज्यादा लोकतंत्र है, जिसकी वजह से कड़े सुधारों लागू करने में मुश्किल आती है। उन्होंने इस कार्यक्रम में देश की भविष्य की अर्थव्यवस्था और देश की आर्थिकी को लेकर इस सरकार के विजन के बारे में भी बहुत कुछ कहा।

ऐसे पैकेजों से क्या होगा?

केंद्र सरकार की मानें तो उसने पिछले हफ्ते अर्थव्यवस्था के लिए तीसरा प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया। बताया गया कि यह 2,65,080 करोड़ रुपयों का पैकेज है।

अर्थव्यवस्था कितना पीछे जाएगी?

बहस हो रही है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी गिरेगी? पहली तिमाही में 24 फीसदी गिरावट रही। दूसरी तिमाही में भी 14 फीसदी तक गिरावट का अनुमान है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि चालू वित्त वर्ष यानी 2020-21 में देश की अर्थव्यवस्था में साढ़े नौ फीसदी की गिरावट रहेगी।

क्या नया बजट पेश होना चाहिए?

निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से घोषित 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की जो बारीकियां बताईं, जानकार लोगों ने कहा कि यह तो बजट हो गया। यानी बजट के बाद मिनी बजट पेश कर दिया गया।

राहत में कोताही क्यों?

क्या कोरोना जैसे असाधारण संकट के समय सरकारी मशीनरी उसी अनुपात में काम नहीं कर रही है, जितना बड़ा ये संकट है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित कहा है कि हमें जान और जहान दोनों की चिंता करनी होगी। मगर सरकार ने “जहान” की जो चिंता की, वह उसकी मशीनरी में प्रतिबिंबित नहीं हुआ है। मसलन, अपने पहले राहत पैकेज में वित्त मंत्री ने किसानों को पीएम-किसान के तहत अगली किश्त का तुरंत भुगतान करने का एलान किया। कोरोना वायरस के कारण उपजे संकट से राहत देने के लिए पिछले महीने 26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना पैकेज की घोषणा की थी। इसके तहत साल 2020-21 के पीएम-किसान की पहली किस्त ‘तत्काल प्रभाव’ से 8.69 करोड़ किसानों को दी जानी थी। मगर इस पैकेज की घोषणा के दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी डेढ़ करोड़ से ज्यादा किसानों को पीएम किसान की पहली किस्त के 2,000 रुपए नहीं मिले थे। केंद्रीय कृषि मंत्रालय की तरफ से एक आरटीआई याचिका पर एक वेबसाइट को मुहैया कराए गए आंकड़ों के मुताबिक 11 अप्रैल 2020 तक में 7.1 करोड़ किसानों को ही पहली किस्त का लाभ मिला था। इसका मतलब हुआ कि 1.59 करोड़ किसानों को… Continue reading राहत में कोताही क्यों?

कोरोना से राहतः पुण्य कमाएं

जिस काम के लिए मैं लगभग एक हफ्ते से लगातार जोर दे रहा हूं, वह काम आज कमोबेश भारत सरकार ने कर दिया। बधाई। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने देश के गरीबों, ग्रामीणों, वंचितों, विकलांगों, दिहाड़ी मजदूरों, छोटे व्यापारियों या यों कहें कि देश के लगभग 80 करोड़ लोगों के लिए तरह-तरह की रहत की घोषणा कर दी है। सरकार अब अगले तीन महिनों में आम-जनता को सहूलियतें देने के लिए एक लाख 70 हजार करोड़ रु. खर्च करेगी। इसे मैं ‘देर आयद्, दुरुस्त आयद’ कहता हूं। यह देर सिर्फ राहतों की घोषणा में ही नहीं हुई है। तालाबंदी की तैयारी में भी हुई है। प्रधानमंत्री ने तालाबंदी पर भाषण दिया और उसके तीन-चार घंटों में ही उसे लागू कर दिया। करोड़ों मजदूर, किसान और व्यापारी और यात्री भी, जहां थे, वही फंस गए। डर के मारे लोग घरों से निकले ही नहीं। हमें लगा कि लोगों में कितना अनुशासन है, कितनी आज्ञाकारिता है लेकिन अब कुछ टीवी चैनल जो सच्चाइयां दिखा रहे हैं, उनसे चिंता पैदा हो रही है। हजारों मजदूर अपने गांव जाने के लिए बस-अड्डों पर भीड़ लगा रहे हैं, कुछ लोग बाल-बच्चों समेत पैदल ही निकल पड़े हैं, सैकड़ों लोग कई शहरों में साग-सब्जी और अनाज की… Continue reading कोरोना से राहतः पुण्य कमाएं

सरकार का पैसा जा कहां रहा?

सरकार नकदी के संकट में है। कई बातों से इसका पता पहले से चल रहा था। पर अब जिस अंदाज में सरकार ने पेट्रोल और डीजल के ऊपर तीन-तीन रुपए का उत्पाद शुल्क और उपकर लगाया है उससे इस बात की पुष्टि हो गई है कि सरकार के पास नकदी की कमी है और वह किसी और उपाय से पैसे नहीं जुटा पा रही है। यह भी साफ हो गया है कि सरकार अपने खर्च में नहीं कर पा रही है तभी उसे अतिरिक्त नकदी का इंतजाम करना पड़ रहा है और फिर भी वित्तीय घाटा तय सीमा से ऊपर चला जा रहा है। तभी सवाल है कि सरकार के पास जो पैसे आ रहे हैं वह कहां जा रहा है? इस सवाल के जवाब में बहुत सरल तरीके से यह कहा जा सकता है कि सरकार की राजस्व वसूली कम हुई है। तब एक दूसरा सवाल उठेगा कि राजस्व वसूली क्यों कम हुई है? जब सरकार ने नोटबंदी के जरिए समूचा काला धन सिस्टम में ला दिया और साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था बन गई और दूसरी ओर वस्तु व सेवा कर, जीएसटी के जरिए परोक्ष कर वसूली की व्यवस्था को भी पुख्ता तरीके से लागू कर दिया गया तब भी राजस्व… Continue reading सरकार का पैसा जा कहां रहा?

गिरती जीडीपी

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को लेकर पिछले हफ्ते सरकार ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वे अर्थव्यवस्था की निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 4.7 फीसद दर्ज की गई है जो पिछले सात साल में सबसे कम है। जीडीपी का इतने न्यूनतम स्तर पर चले जाना अर्थव्यवस्था की दशा को बताने के लिए पर्याप्त है। जीडीपी का इतना गिर जाना इस बात का भी प्रमाण है कि मंदी का जो दौर दिसंबर 2018 में शुरू हुआ था, वह अभी बना हुआ है और भविष्य में भी सुधार के संकेत नहीं दिख रहे हैं। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के बड़े और प्रमुुख क्षेत्रों में तीसरी तिमाही में कोई सुधार दिखाई नहीं दिया है। चाहे बिजली क्षेत्र हो या इस्पात क्षेत्र, उत्पादन में सबकी हालत खराब है। तीसरी तिमाही को छोड़ दें तो इस जनवरी में भी इस्पात उत्पादन में 3.26 फीसद की गिरावट आई है। तीसरी तिमाही में कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पादन, सीमेंट जैसे क्षेत्रों में उत्पादन की रफ्तार न सिर्फ मंद रही, बल्कि पिछले वर्षों के मुकाबले भी इनमें भारी गिरावट का दौर रहा। यह इस बात का संकेत है कि देश की जीडीपी… Continue reading गिरती जीडीपी

मानो निजीकरण हर समस्या का समाधान!

वित्त वर्ष 2020-21 का बजट देश कर ऐसा लग रहा है कि सरकार निजीकरण को हर समस्या का समाधान मान रही है। ध्यान रहे पिछले कुछ समय से निजी सार्वजनिक भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल की बात कम हो गई थी। पर सरकार फिर इस मॉडल को रिवाइव कर रही है। निर्मला सीतारमण ने इस बार अपने बजट में निजी सार्वजनिक भागीदारी से कई काम करने का ऐलान किया। जैसे सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी निजी कंपनियों के साथ साझेदारी पर विचार कर रही है। बजट में कहा गया है कि सरकार जिला स्तर पर निजी कंपनियों के साथ भागीदारी करेगी। ध्यान रहे नीति आयोग ने इस तरह का प्रस्ताव दिया था। सूत्रों के मुताबिक आयोग के प्रस्ताव में जिला सदर अस्पतालों में निजी मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों को भागीदार बनाने की बात कही गई है। सरकार रेलवे के निजीकरण की तरफ भी तेजी से कदम बढ़ा रही है। अब तक जो बातें सूत्रों के हवाले से कही जा रही थी वह वित्त मंत्री ने बजट में कह दिया। उन्होंने कहा कि सरकार डेढ़ सौ ट्रेनें निजी हाथों में देने जा रही है। तीसरी तेजस ट्रेन के रूट की भी घोषणा कर दी गई। सूत्रों के मुताबिक अब कहा जा… Continue reading मानो निजीकरण हर समस्या का समाधान!

माली मुश्किलों का दस्तावेज

आर्थिक सर्वेक्षण से आर्थिक क्षेत्र में बदहाली को जो तस्वीर उभरी थी, बजट ने उसकी और पुष्टि कर दी। या इसे ऐसे कहा जा सकता है कि देश की माली हालत जिस बदहाली में पहुंच गई है, उससे निकालने का कोई रोड मैप पेश करने में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन नाकाम रहीं। उलटे भारतीय जीवन बीमा निगम में सरकारी हिस्सेदारी बेचने जैसी घोषणाओं ने नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। मगर असली समस्या यह है कि सरकारी खजाने का घाटा अनियंत्रित हो गया है। नतीजतन, राजकोषीय दायित्व एवं प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) के तहत तय राजकोषीय घाटे के लक्ष्य की उलटी दिशा में चलने को सरकार मजबूर हो गई है। चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद के 3.3 प्रतिशत तक इस घाटे को रखने का लक्ष्य सरकार हासिल नहीं कर पाई। अब सरकार ने खुद मान लिया है कि ये घाटा 3.8 प्रतिशत रहेगा। अगले साल भी इसे 3.5 फीसदी तक ही लाने का लक्ष्य वह रख पाई, जबकि पहले इसे तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य था। इसके पहले 2019-20 वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करने के बाद केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने कहा था कि इसका मूल विषय है संपत्ति का सृजन। यह कैसे… Continue reading माली मुश्किलों का दस्तावेज

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