भोपाल का शांत ओपेरा
भारत का साहित्यिक भविष्य केवल मेगा-उत्सवों पर नहीं टिक सकता। उसे जड़ों वाले, उच्च-सत्यनिष्ठ केंद्रों का नक्षत्र चाहिए, विशेषकर द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में, जहाँ जिज्ञासा प्रचुर है पर मंच दुर्लभ। बीएलएफ दिखाता है कि जब गंभीरता पर भरोसा किया जाए और ज्ञात श्रोताओं का सम्मान हो, तो क्या संभव है। इसका प्रभाव दिखने लगा है। ऐसे समय में जब साहित्यिक उत्सव सांस्कृतिक कार्निवल जैसे दिखने लगे हैं, भीड़ की चमक, सेलेब्रिटी का प्रभामंडल और सोशल मीडिया की निरंतर गूंज की शौशेबाजी को ही जीवंतता माना जा रहा है, तब यह भूलना आसान है कि पैमाना चकाचौंध पैदा...