राष्ट्रवाद यानी जिन्दाबाद-मुर्दाबाद, बस!
भारत के विश्वगुरु होने की बातें घोर लज्जाजनक हैं! वस्तुत: ज्ञान का दंभ भरना सब से दयनीय है। सवा अरब आबादी के खाते-पीते देश में अब हिन्दी या अंग्रेजी में भी एक भी साहित्यिक/वैचारिक पत्रिका नहीं जो पूरे देश में जानी भी जाती हो। अर्थात्, देश के हर कोने में पहुँच रखने वाला कोई साहित्यिक, वैचारिक मंच तक नहीं। यह दुर्दशा अंग्रेजी राज में कतई न थी। आज कोई हिन्दी टीवी चैनल भी नहीं जिस से प्रतिदिन देश-विदेश के महत्वपूर्ण समाचार भी मिलें। हमारे यहाँ सिर्फ तमाशा, चीख-पुकार, तू-तू-मैं-मैं का रेला भर है। राष्ट्रवाद एक रोग-नशा है, जिस से देश...