ग़ज़ब के हैं पौराणिक शिव
शिव रौद्र भी हैं और सौम्य भी। त्रिदेवों में वे संहार के देवता हैं — लेकिन संहार उनके लिए अंत नहीं, नए आरंभ की भूमिका है। वे समय के पार हैं — महाकाल। उनके गले में सर्प, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, हाथ में त्रिशूल और डमरू — यह सब विरोधी प्रतीकों का एक साथ होना उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे अर्द्धनारीश्वर हैं, पर कामजित भी। गृहस्थ भी हैं, लेकिन श्मशानवासी। वेदों में ईश्वर एक ही है — निराकार, सर्वशक्तिमान और अनगिनत गुणों से भरा। इन गुणों के कारण उसे कई नाम दिए गए, उन्हीं में एक है ‘शिव’।...