संयुक्त राष्ट्र का ढ़लता जलवा!
किसने सोचा था कि इंसान की तरह कोई संस्था बूढ़ी हो सकती है? और उम्र के साथ जहाँ बुद्धिमत्ता और गहराई आनी चाहिए, वही उलटा हो। वह चमक-दमक में ढलने लगे। विश्व राजनीति, व्यवस्था की पंचायत संयुक्त राष्ट्र अब अस्सी की उम्र में स्थिरता से खड़ी नहीं है बल्कि काँप रही है। न्यूयार्क के ईस्ट रिवर किनारे उसकी इमारत यों खड़ी है, लेकिन आत्मा थक चुकी है। मक़सद बिखर रहा है, मनोबल मुरझा रहा है। और जो बचा है वह समझ और परिपक्वता की आभा नहीं बल्कि बुढ़ापे की धुँधलाहट है। मानो मृत्यु का साया आसपास मंडरा रहा हो। इसीलिए...