Vande Mataram Row

  • वंदे मातरम् से तब था सत्य, स्वदेशी, अब है झूठ, झांसा और चीन की आर्थिक गुलामी

    न डेढ़ सौ साल पहले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने कल्पना की होगी और न 1896 में रविंद्रनाथ टैगोर या बाद में महर्षि अरविंद या गांधी या आनंद भवन में विदेशी कपड़ों की होली जलाते नेहरू की यह कल्पना रही होगी कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कोई मोदी सरकार भी आएगी, जो सत्य, स्वदेशी को गिरवी रख उनकी भावना के वंदे मातरम् पर भी प्रोपेगेंडा का झांसा रचेगी। हां, इन सबके लिए वंदे मातरम् का गान सत्य, स्वाभिमान, स्वतंत्रता और “स्वदेशी आत्मा का संगीत” था। ‘वंदे मातरम्’ तब राष्ट्रभक्तों की सत्य-प्रतिज्ञा का संकल्प था। मां की रक्षा के साथ उसकी गरिमा...

  • वंदे मातरम् में तब अंतिम व्यक्ति का संकल्प था, न कि अडानियों–अंबानियों को सिर पर बैठाना

    यों मोदीजी और संघ दर्शन के चिंतक कह सकते हैं कि सरकार गरीबों को पैसा, राशन आदि बांटकर खजाना लुटा दे रही है, इसलिए 1947 से पहले वंदे मातरम् के साथ जन-गण की चिंता के संकल्प को सरकार पूरा करने में सौ टका खरी है। सो गांधी के सच्चे अनुयायी प्रधानमंत्री मोदी हैं, जिन्होंने जनधन खाते खुलवाकर गरीब के खाते में पैसा पहुंचाया। हां, गांधी ने अंतिम व्यक्ति के कल्याण को ‘सबसे बड़ी नीति कसौटी’ कहा था। इसी में भक्त दलील देंगे कि मोदी सरकार ने गरीब को ‘लाभार्थी’ तो बनाया। ‘अंतिम व्यक्ति’ का ‘अंत्योदय’ हुआ। सबके बैंक खाते हैं,...