बाईबैक ऐसा चलन है, जिससे कंपनियां बाजार में बिना अपना प्रदर्शन सुधारे अपने मूल्य में बढ़ोतरी कर लेती हैं। ऐसा वे शेयरधारकों से अपनी ही कंपनी के शेयरों को खरीद कर करती हैं। इससे कंपनी के शेयरों के भाव बढ़ जाते हैं।
कॉरपोरेट कानून (संशोधन) विधेयक- 2026 को संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पर बनी सहमति स्वागतयोग्य है। आशा है, समिति बिल में मौजूद कुछ समस्याओं को दूर करने में सफल रहेगी। ऐसी ही एक समस्या शेयर बाईबैक का प्रावधान है। नए बिल के तहत कुछ श्रेणी की कंपनियां साल में दो बार बाईबैक कर सकेंगी। फिलहाल, उन्हें एक बार ऐसा करने की इजाजत मिलती है। बाईबैक ऐसा चलन है, जिससे कंपनियां बाजार में बिना अपना प्रदर्शन सुधारे अपने मूल्य में बढ़ोतरी कर लेती हैं। ऐसा वे शेयरधारकों से अपनी ही कंपनी के शेयरों को खरीद कर करती हैं। इससे शेयरों के भाव बढ़ जाते हैं। नतीजतन कंपनी की सकल कीमत बढ़ जाती है। फिर शेयरों के बढ़ते भाव को देख कर बहुत से नए निवेशक संबंधित कंपनी के शेयरों में पैसा लगाते हैं।
कुल मिलाकर यह एक तरह का स्टॉक हेरफेर है, जिससे कंपनियां अपना मूल्य बढ़ाती हैं। अर्थव्यवस्था के अधिक से अधिक होते गए वित्तीयकरण के साथ ऐसे चलन बढ़ते चले गए हैं। अब आम समझ बनी है कि वास्तविक अर्थव्यवस्था के हित में ऐसी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने की जरूरत है। मगर भारत सरकार अपने देश की कंपनियों के लिए बाईबैक के अवसर दोगुना करने जा रही है। संसदीय समिति को इस पर अवश्य गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार ने कंपनी ऐक्ट 2013 और एलएलपी ऐक्ट 2008 में संशोधन के लिए जो नया बिल पेश किया है, उसमें एक प्रावधान कंपनियों पर से कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) का बोझ घटाने से संबंधित है।
उसके तहत 10 करोड़ रुपये सालाना मुनाफा कमाने वाली कंपनी पर ही सीएसआर का प्रावधान लागू होगा। फिलहाल 1000 करोड़ रुपये टर्नओवर या कुल मूल्य 500 करोड़ रुपये अथवा पांच करोड़ रुपये सालाना मुनाफा वाली कंपनी को मुनाफे का दो फीसदी सीएसआर पर खर्च करना होता है। सीएसआर आरंभ से विवादास्पद प्रावधान रहा है। इसलिए उचित होता कि सरकार इस कॉन्सेप्ट पर ही पुनर्विचार करती। संसदीय समिति को सोचना चाहिए कि क्या यह उचित नहीं होगा कि समाज कल्याण की जिम्मेदारी कंपनी पर डालने के बजाय निर्वाचित सरकार वो रकम टैक्स के रूप में लेकर जन कल्याण करे?


