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यह एक दुखद तस्वीर है

ByNI Editorial,
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भारतीय कुश्ती परिसंघ पर बृजभूषण सिंह का परोक्ष नियंत्रण बने रह जाने से आहत ओलिंपिक पद विजेता पहलवान साक्षी मलिक ने रिटायरमेंट का एलान कर दिया। उसके बाद एक अन्य चैंपियन पहलवान बजरंग पुनिया अपने पदमश्री का तमगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास फुटपाथ पर रख आए। विनेश फोगट के साथ इन दोनों पहलवानों ने कुश्ती परिसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण सिंह पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे। पहले उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री से शिकायत की। जब इंसाफ नहीं मिला, तो लगभग 40 रोज तक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया था। लेकिन उस धरने का वही अंजाम हुआ, तो वर्तमान सरकार के तहत किसी विरोध प्रदर्शनों का होता है। सिंह का रुतबा इतना ज्यादा है कि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए पहलवानों को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। न्यायिक मामला अब कोर्ट में है। लेकिन इस प्रकरण से खेल संघों पर राजनीति में रसूख रखने वाले ऐसे लोगों का शिकंजा कसे होने का मुद्दा भी उठा है, जो अपनी पूरी मानमानी चलाते हैँ।

खेल संघों का गठन खेल और खिलाड़ियों के हित में होने के बजाय विशुद्ध रूप से राजनीतिक गुणा-भाग से होता है। इसलिए अक्सर सत्ताधारी पार्टी से जुड़े नेता या उनके प्रॉक्सी वहां काबिज हो जाते हैं। तकरीबन एक दशक पहले यह मुद्दा गरमाया था। बीसीसीआई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तब कई प्रभावी दिशा-निर्देश भी दिए थे। लेकिन फौरी हलचल के बाद वे सारी चर्चा जमींदोज हो गई। इस तरह खेल संघों के गठन और संचालन का तौर-तरीका पहले जैसा बना रह गया। इस बीच नई बनी राजनीतिक परिस्थितियों में सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं में एक तरह की निर्भयता और जनमत के प्रति बेरुखी भी आ गई है। कुश्ती परिसंघ से संबंधित विवाद में यह बात खुलकर सामने आई है। इसका महिला खिलाड़ियों के मनोविज्ञान और खेल जगत में भारत के भविष्य पर कितना दुष्प्रभाव होगा, इसका फिलहाल अनुमान ही लगाया जा सकता है। जिस देश में गिने-चुने चैंपियन खिलाड़ी ही हों और फिर भी उनका इस हद तक अनादर हो, तो इसे एक दुखद स्थिति ही कहा जाएगा।

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