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ईडी पर हमला क्यों?

ByNI Editorial,
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सरकारी कामकाज में लगे अधिकारियों को निशाना बनाना देश में कानून-व्यवस्था और लोकतंत्र के बुनियादी कायदों के हो रहे ह्रास का संकेत है। इसलिए सभी पक्षों को पश्चिम बंगाल में हुई घटना के कारणों पर पूरी गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता के यहां जांच के सिलसिले में गए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों पर उस नेता के समर्थकों का हमला ऐसी घटना है, जिसे किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अपेक्षित है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां इस कांड में तत्परता से उचित कार्रवाई करेंगी। सरकारी कामकाज में लगे अधिकारियों को इस तरह निशाना बनाना देश में कानून-व्यवस्था और लोकतंत्र के बुनियादी कायदों के हो रहे ह्रास का संकेत है। इसलिए सभी पक्षों को इस घटना पर पूरी गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए। सवाल है कि केंद्र सरकार की एक एजेंसी को खासकर विपक्षी खेमों में खलनायक की तरह क्यों देखा जा रहा है? उल्लेखनीय है कि दो मुख्यमंत्री झारखंड के हेमंत सोरेन और दिल्ली के अरविंद केजरीवाल लगातार ईडी के समन की अवहेलना कर रहे हैं। केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी खुलेआम सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग कर रही है।

इन एजेंसियों को दूसरी पार्टियों को तोड़ने और उनके नेताओं को भाजपा में शामिल कराने का औजार बना लिया गया है। केजरीवाल की इस राय से विपक्ष का ज्यादातर हिस्सा सहमत नजर आता है, तो उसकी एक वजह है। 2022 में एक अंग्रेजी अखबार ने ईडी की तरफ से दर्ज किए मुकदमों पर एक रिपोर्ट दी थी। उसके मुताबिक मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के लिए बने कानून- पीएमएलए में 2019 में बदलाव कर ईडी को यह शक्ति दे दी गई कि वह लोगों के आवास पर छापेमारी, सर्च और गिरफ़्तारी कर सकती है। इससे पहले किसी अन्य एजेंसी की ओर से दर्ज की गई एफ़आईआर और चार्ज़शीट में पीएमएलए की धाराएं लगने पर ही ईडी जांच करती थी, लेकिन अब ईडी ख़ुद एफ़आईआर दर्ज करके गिरफ़्तारी कर सकती है। उस रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014 से 2022 तक ईडी के निशाने पर रहे क़रीब 95 फ़ीसदी यानी 115 नेता विपक्ष के थे। इसलिए ये धारणा गहराती चली गई है कि ईडी विपक्ष को परेशान करने वाली एजेंसी बन गई है। यह जरूरी है कि ईडी की इस नकारात्मक छवि को तोड़ा जाए, ताकि उसमें सबका भरोसा बहाल हो सके।

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