साल 1990 में भारत में औसतन हर एक लाख शिशु जन्म के दौरान 508 माताओं की मौत होती थी। ये संख्या 2023 में 116 तक आ गिरी। फिर भी भारत वैश्विक स्तर पर कम विकसित देशों की श्रेणी में ही आता है।
मातृत्व मृत्यु दर की अवस्था (शिशु को जन्म देने के क्रम में माताओं की होने वाली मौतें) सामाजिक विकास का एक प्रमुख पैमाना है। बीते साढ़े तीन दशक में भारत ने इस कसौटी पर अच्छी प्रगति की है। लेकिन 2015 के बाद से प्रगति की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है। मशहूर ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लांसेट ने एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट में बताया है कि साल से 2000 से 2015 की अवधि सबसे तेज प्रगति की रही, जब अस्पताल/ क्लीनिक में प्रसव, प्रसव-पूर्व देखभाल में सुधार, और आम तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के कारण मातृत्व मृत्यु दर में बड़ी गिरावट आई। लेकिन 2015 से 2023 की अवधि में ये रफ्तार सुस्त हो गई है।
अध्ययनकर्ताओं ने कहा है कि ये परिघटना उन व्यवस्थागत चुनौतियों की ओर इशारा करती है, जिनका हल ढूंढना कठिन बना हुआ है। प्रसव के दौरान अधिक खून बहना, हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी दिक्कतें, और आम देखभाल में कमी गर्भवस्था या डिलिवरी के दौरान माताओं की मौत की बड़ी वजहें बनी हुई हैं। ये वो कारण हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है, मगर उसके लिए लक्ष्य केंद्रित सार्वजनिक पहल की जरूरत है। संभवतः इसमें कमी के कारण ही 2023 में भारत में 24,700 महिलाओं की मौत मां बनने के क्रम में हो गई। 1990 में ये संख्या 1.19 लाख और 2015 में 36,900 थी। जाहिर है, प्रगति का क्रम बना हुआ है, मगर वार्षिक प्रगति की रफ्तार धीमी हुई है।
1990 में भारत में औसतन हर एक लाख शिशु जन्म के क्रम में 508 माताओं की मौत होती थी। ये संख्या 2023 में 116 तक आ गिरी। इसके बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस दर के साथ भारत वैश्विक स्तर पर नाईजीरिया, इथोपिया और पाकिस्तान जैसे कम विकसित देशों की श्रेणी में आता है। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के तहत प्रति एक लाख जन्म पर मातृत्व मृत्यु दर को 70 के नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है। यानी भारत को अभी भी प्रगति का लंबा रास्ता तय करना है। अतः जरूरी है कि इसकी रफ्तार धीमी ना होने दी जाए।


