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महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान बेंच ने केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मसले पर मंगलवार को सुनवाई शुरू की। इस मामले में सर्वोच्च अदालत एक बार फैसला सुना चुकी है। लेकिन केंद्र सरकार सहित कई समूह इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। सो, अब बड़ी बेंच इस पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई की टाइमिंग बहुत दिलचस्प है। दो दिन के बाद गुरुवार को केरल में मतदान होना है, जिसके लिए मंगलवार को प्रचार बंद हुआ।

मंगलवार को सुनवाई शुरू हुई तो केंद्र सरकार ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि हर उम्र की महिला को मंदिर में प्रवेश की इजाजत देने का फैसला सही नहीं है। केंद्र सरकार ने पहले ही दिन की सुनवाई में सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन किया। केरल के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा बना हुआ है। बहरहाल, मंगलवार को पहले दिन नौ जजों की संविधान बेंच ने पांच घंटे सुनवाई की।

सरकार ने मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी का समर्थन करते हुए कहा, ‘2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को एंट्री देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत था। यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अपने अधिकार से जुड़ा है’। सरकार ने कहा, ‘अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं। अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास’।

केंद्र सरकार की इस दलील इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, ‘इस मामले में अनुच्छेद 17 यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने तीन दिन तक तो महिला को अछूत माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई अछूतपन न रह जाए’। इससे पहले केंद्र की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 2018 के सबरीमाला फैसले में कहा गया था कि 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अछूत प्रथा के बराबर है।

बहरहाल, केंद्र सरकार ने कहा, ‘हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए और हर चीज को गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना जरूरी है, तो इसे अधिकारों का हनन नहीं कहा जा सकता’। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है’। सुप्रीम कोर्ट में 22 अप्रैल तक लगातार इस मामले की सुनवाई होगी। अदालत करीब 50 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

By NI Desk

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