राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

अमेरिका-ईरान के बीच 60-दिन का समझौता बेनतीजा, परमाणु मुद्दे, होर्मुज पर तनाव बरकरार

अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हुए 60-दिन के समझौते की समय सीमा सोमवार को समाप्त हो गयी, लेकिन दोनों देश युद्ध समाप्त करने, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने पर सहमति नहीं बना सके। इससे आगे की बातचीत और क्षेत्र में शांति की संभावनाएं अनिश्चित हो गयी हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच फ्रांस के वर्साय में हुए समझौते का उद्देश्य अस्थायी संघर्ष विराम को स्थायी समझौते में बदलना था। इसके तहत 60 दिनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, संघर्ष की समाप्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर व्यापक समझौता किया जाना था।

इन तीनों प्रमुख उद्देश्यों में से कोई भी पूरा नहीं हो सका। कुछ ही सप्ताह में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर समझौते का उल्लंघन करने का आरोप लगाना शुरू कर दिया। प्रत्यक्ष बातचीत भी रुक गयी और ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी जारी रही।

होर्मुज जलडमरूमध्य में भी सामान्य आवाजाही बहाल नहीं हो सकी। वर्तमान में केवल पांच मालवाहक जहाजों को इसके रास्ते गुजरने की अनुमति है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन करीब 130 से 140 जहाज इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से गुजरते हैं।

समझौते के तहत ईरान को जलडमरूमध्य खोलने में मदद करनी थी और अमेरिका को तेहरान पर दबाव कम करना था। लेकिन दोनों पक्ष इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि जलमार्ग पर यातायात किसके नियंत्रण में और किन शर्तों के तहत संचालित होगा।

ईरान ने जलडमरूमध्य खोलने के लिए अमेरिकी नाकाबंदी हटाने की शर्त रखी है, जबकि अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया है। तेहरान ने होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण और संभावित शुल्क वसूलने में भूमिका की भी मांग की है।

तनाव आठ जुलाई को और बढ़ गया, जब श्री ट्रंप ने नाटो सम्मेलन के दौरान समझौते को समाप्त घोषित कर दिया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान के सैन्य और तटीय ठिकानों पर हमले किए। इनमें मिसाइल और ड्रोन भंडारण केंद्र, रसद केंद्र, वायु रक्षा एवं निगरानी प्रणालियां तथा नौसैनिक और तटीय ढांचे शामिल थे।

ईरान ने जवाबी कार्रवाई में बहरीन, कुवैत, कतर और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अन्य सैन्य एवं संचार प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। इसके बाद 60 दिनों के भीतर व्यापक समझौते की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गयीं।

Also Read : रिजिजू की टिप्पणी के बाद महबूबा मुफ्ती ने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहा

इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाते हुए उन प्रतिबंधों में मिली छूट वापस ले ली, जिनके तहत संघर्ष विराम के दौरान ईरान सीमित रूप से तेल बेच सकता था। अमेरिका ने ईरान पर रियायतों के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी भी फिर शुरू कर दी।

ईरान ने दूसरी ओर होर्मुज को अपने दबाव के प्रमुख साधन के रूप में इस्तेमाल किया है। उसने जलमार्ग को पूरी तरह खोलने के लिए अमेरिकी नाकाबंदी हटाने, ईरान के आसपास से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और युद्ध क्षतिपूर्ति की मांग की है।

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका का पहला उद्देश्य देश में तेल और गैस की कीमतों को कम रखना और दूसरा ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु हथियार विकसित करने का कोई इरादा नहीं है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि फिलहाल तेहरान और वाशिंगटन के बीच कोई प्रत्यक्ष बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि कतर और पाकिस्तान मध्यस्थ के तौर पर ईरान के साथ संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, लेकिन इसे बातचीत नहीं माना जा सकता।

पाकिस्तान ने जून के समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभायी थी और दोनों पक्षों को फिर बातचीत की मेज पर लाने के प्रयास जारी रखने की बात कही है।

60 दिन की समयसीमा समाप्त होने के साथ समझौता युद्धविराम को स्थायी बनाने, होर्मुज को पूरी तरह खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक समझौता कराने में विफल रहा है। प्रत्यक्ष बातचीत बंद होने, अमेरिकी नाकाबंदी जारी रहने और सैन्य तनाव बरकरार रहने के बीच अब यह स्पष्ट नहीं है कि इस विफल समझौते की जगह आगे कौन-सा ढांचा सामने आएगा।

Pic Credit : ANI

By Naya India

Naya India, A Hindi newspaper in India, was first printed on 16th May 2010. The beginning was independent – and produly continues to be- with no allegiance to any political party or corporate house. Started by Hari Shankar Vyas, a pioneering Journalist with more that 30 years experience, NAYA INDIA abides to the core principle of free and nonpartisan Journalism.

Leave a comment