अजित पवार के निधन से महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा। ऐसा होना न तो अनायास होगा और न आश्चर्यजनक होगा। आमतौर पर इतने बड़े नेता का जब भी असमय निधन होता है या उसके साथ कोई हादसा होता है तो राजनीति बदलती है। कई राज्यों में इसके प्रमाण मिल जाएंगे। अरुणाचल प्रदेश में हेलीकॉप्टर हादसे में तत्कालीन मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के निधन के बाद अरुणाचल की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई। कलिखो पुल थोड़े दिन मुख्यमंत्री रहे और बाद में उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाने के बाद खुदकुशी कर ली थी। दोरजी खांडू के बेटे पेमा खांडू ने पहले अलग पार्टी बनाई और फिर पार्टी का भाजपा में विलय करके भाजपा के मुख्यमंत्री बन गए। अरुणाचल प्रदेश, जहां कांग्रेस का इतना मजबूत आधार था वहां वह पूरी तरह से खत्म हो गई।
इसी तरह आंध्र प्रदेश में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी का निधन हुआ तो पूरी राजनीति बदल गई। वे संयुक्त आंध्र प्रदेश के आखिरी क्षत्रप साबित हुए। उनके निधन के बाद कांग्रेस ने उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी को सीएम नहीं बनाने की जिद में किरण रेड्डी और के रोसैया का प्रयोग किया और अंत में राज्य का विभाजन हुआ। विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश में कांग्रेस का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो गया। 2014 से लेकर अभी तक तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का खाता नहीं खुल पाया है। अलग हुए राज्य तेलंगाना में 10 साल के बाद जरूर कांग्रेस लौटी लेकिन आंध्र प्रदेश में कोई संभावना नहीं दिख रही है।
मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया के विमान दुर्घटना में निधन के बाद पिछले करीब 25 साल में कांग्रेस सिर्फ एक बार बहुमत के करीब पहुंच पाई है और उस समय भी सिर्फ सवा साल की ही सरकार बनी। राजीव गांधी के निधन के बाद की राष्ट्रीय राजनीति का सबको पता है। कांग्रेस की राजनीति में कैसी उथलपुथल रही वह भी सबको पता है। भारतीय राजनीति के इतिहास की इस पृष्ठभूमि में जब अजित पवार के विधन को देखते हैं तो साफ दिखाई देता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत सी चीजें बदल सकती हैं। मौजूदा सरकार और राजनीति दोनों का शक्ति संतुलन प्रभावित होगा। अजित पवार एक संतुलनकारी ताकत के तौर पर महाराष्ट्र की राजनीति में मौजूद थे।
इसमें संदेह नहीं है कि उनकी पार्टी रहेगी लेकिन उनके जैसी राजनीति करने वाला कोई नहीं होगा। 2024 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने 235 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल किया तब भी सरकार का गठन कई दिनों तक अटका रहा था। एकनाथ शिंदे नाराजगी दिखा रहे थे। उस समय भी ब्रेक थ्रू अजित पवार ने दिया था। देवेंद्र फड़नवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब एक पत्रकार ने शिंदे से पूछा, ‘क्या आप उप मुख्यमंत्री बनेंगे’? वे कुछ बोलते उससे पहले अजित पवार ने कहा, ‘एकनाथ शिंदे का पता नहीं हैं लेकिन मैं शपथ ले रहा हूं’। इसके बाद अपने आप सारा खेल बदल गया था।
अजित पवार एक तरफ से देवेंद्र फड़नवीस की राजनीति के लिए कवच का काम कर रहे थे। फड़नवीस के साथ उन्होंने एक बार 80 घंटे की सरकार भी बनाई थी। उससे भी पता चलता है कि दोनों के बीच केमिस्ट्री कैसी थी। अब फड़नवीस की राजनीति का वह कवच हट गया है। उन्हें अब अकेले पार्टी के अंदर के संघर्ष का मुकाबला करना होगा और पार्टी के बाहर गठबंधन की राजनीति यानी एकनाथ शिंदे के दांवपेंच का भी मुकाबला अकेले करना होगा। फड़नवीस चाहेंगे कि अजित पवार की पार्टी की कमान ऐसे व्यक्ति के हाथ में हो, जिसके साथ वे सहजता से सारी बातें कर सकें। अजित पवार के परिवार से कौन फड़नवीस के साथ उप मुख्यमंत्री बनता है और बारामती की सीट से कौन उपचुनाव लड़ता है इससे बहुत कुछ तय होगा।
जहां तक अजित पवार की पार्टी का सवाल है तो उनके सामने कई विकल्प हैं। एक विकल्प तो यथास्थिति का है। लेकिन नेता के नहीं होने पर यथास्थिति संभव नहीं होती है। इसके बावजूद पार्टी के पास स्वतंत्र राजनीति का रास्ता है। अगर अजित पवार की पार्टी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखती है तो उसके लिए अच्छा होगा लेकिन उसके लिए जरूरी है कि कोई मजबूत नेता पार्टी की कमान संभाले। ऐसा नेता, जो भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी उसे आंख दिखा सके और जरुरत पड़ने पर भाजपा को रोकने के लिए उसकी विरोधी पार्टी से भी तालमेल कर सके। ध्यान रहे अजित पवार ने शहरी निकाय चुनाव में शरद पवार की पार्टी से तालमेल किया था। इस तरह की स्वतंत्र राजनीति सबसे अच्छा विकल्प है। दूसरा विकल्प शरद पवार का नेतृत्व स्वीकार करने और दोनों एनसीपी के विलय का है। कहा जा रहा है कि अजित पवार कुछ समय से इसकी तैयारी कर रहे थे। अगर उन्होंने कोई रूपरेखा बनाई हो तब इस रास्ते पर जाना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
लेकिन तब भी यह सवाल रहेगा कि नेता कौन होगा? जाहिर तौर पर 85 साल के शरद पवार तो नेता नहीं हो सकते हैं। फिर कौन? सुप्रिया सुले, सुनेत्रा पवार, पार्थ व जय पवार में से कोई या रोहित व युगेंद्र पवार में से कोई या परिवार से बाहर के सुनील तटकरे, प्रफुल्ल पटेल और धनंजय मुंडे? एक तीसरा विकल्प अपनी स्वतंत्रता से समझौता करके भाजपा की शरण में जाने का है। अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार अपने दोनों युवा बेटों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह रास्ता चुन सकती हैं। एक बार चुनाव लड़ चुके पार्थ पवार राज्य सरकार में शामिल हों और सुनेत्रा खुद केंद्र की सरकार में मंत्री बनें। यह स्थिति देवेंद्र फड़नवीस के भी अनुकूल हो सकती है।
जो हो इतना तय है कि अजित पवार के अचानक महाराष्ट्र के राजनीतिक क्षितिज से चले जाने से प्रदेश की राजनीति का लैंडस्केप भी पूरी तरह से बदलेगा। भारतीय जनता पार्टी इसमें अपने विस्तार की संभावना देख रही होगी। ध्यान रहे जब शिव सेना एकजुट थी और एनसीपी भी एकजुट थी तब भाजपा अपना विस्तार उन इलाकों में करना चाहती थी, जहां उसका मजबूत आधार नहीं था। लेकिन दो मजबूत प्रादेशिक पार्टियों की वजह से वह ऐसा नहीं कर पा रही थी। तभी उसने शिव सेना में विभाजन को डिजाइन किया और एनसीपी का विभाजन भी प्लान किया। दोनों पार्टियों के बंटने और कमजोर होने के बाद के पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 132 सीटें जीतीं।
उसके बाद पहले स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने प्रदेश भर में ग्रामीण व शहरी इलाकों में 50 फीसदी सीटें हासिल की। शिव सेना के असर वाले इलाकों यानी महाराष्ट्र मेट्रोपोलिटन रीजन, एमएमआर में मुंबई उसने एक तरह से कब्जा कर लिया और ठाणे को छोड़ कर कल्याण डोंबिवली व उल्लासनगर में वह शिंदे सेना की बराबरी में रही। एमएमआर और कोंकण दोनों इलाके में उद्धव की पार्टी हाशिए पर चली गई। ऐसे ही पुणे, पिंपरी चिंचवाड़ और परभणी में शरद व अजित पवार के एक साथ लड़ने पर भी भाजपा ने उनको हरा दिया। विदर्भ में पहले से भाजपा का मजबूत आधार है। अब अजित पवार के नहीं रहने के बाद भाजपा पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में अपना आधार बढ़ा सकती है। वह दोनों शिव सेना और दोनों एनसीपी को समाप्त करके या बहुत कमजोर करके महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी निर्णायक बढ़त स्थापित कर सकती है।
शरद पवार इस स्थिति को समझ रहे होंगे और वे परिवार के भीतर भाजपा की विस्तारवादी राजनीति से होने वाले संभावित नुकसान पर बात भी करेंगे। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे को भी भाजपा की इस राजनीति का अंदाजा होगा। परंतु इन चारों प्रादेशिक पार्टियों के क्षत्रपों को यह भी अंदाजा होगा कि वे अकेले दम पर भाजपा की इस राजनीति का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। महाराष्ट्र की राजनीति में एक खालीपन कांग्रेस के कमजोर होने से भी है। कांग्रेस के पास अगर विलासराव देशमुख जैसा कोई करिश्माई और मजबूत नेता होता तो वह भाजपा विरोधी पार्टियों को एक मंच पर लाने का प्रयास कर सकता था। बहरहाल, अगले कुछ दिन महाराष्ट्र की राजनीति में उथलपुथल के रहेंगे और जब अजित पवार के असमय व दुखद निधन से उठा तूफान थमेगा तब दीर्घकालिक राजनीति की तस्वीर बननी शुरू होगी।


