विधान परिषद के औचित्य और इनके चुनावों की प्रक्रिया को लेकर गंभीरता से सोचने की जरुरत है। अभी चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों के लिए हुए चुनाव से इस पर विचार की आवश्यकता रेखांकित हुई है। सबसे पहले तो इसी सवाल पर विचार होना चाहिए कि देश के छह राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधानमंडल दो सदन वाला है यानी विधानसभा और विधान परिषद दोनों हैं, जबकि बाकी राज्यों में ऐसा क्यों नहीं है? यह तय करने का क्या पैमाना है कि किसी राज्य में विधान परिषद होगा या नहीं होगा? बहुत छोटे या एक सौ से कम विधानसभा सीटों वाले राज्यों में विधान परिषद नहीं होना समझ में आता है लेकिन बड़े राज्यों में भी अंतर क्यों है?
243 सीटों वाले बिहार में विधान परिषद होगा लेकिन 294 सदस्यों वाले पश्चिम बंगाल, 239 सदस्यों वाले तमिलनाडु, 230 सदस्यों वाले मध्य प्रदेश और दो सौ सदस्यों वाले राजस्थान में नहीं होगा तो इसके पीछे क्या तर्क है? क्या यह कहना पर्याप्त होगा कि ऐतिहासिक रूप से जो परंपरा चली आ रही है, उसे कायम रखा गया है? ऐतिहासिक रूप से तो जम्मू कश्मीर में भी विधान परिषद थी, लेकिन अब उसे खत्म कर दिया गया है। फिर दूसरे राज्यों में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है? अगर आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद 147 सदस्यों वाले तेलंगाना में विधान परिषद है तो 140 सदस्यों वाले केरल में क्यों नहीं है?
जाहिर है यह व्यवस्था मनमानी है। इसके पीछे कोई तर्क नहीं है। अगर एक राज्य में उच्च सदन की जरुरत इसलिए है ताकि चेक एंड बैलेस बना रहे और विधानसभा की मनमानियों पर रोक लगे तो दूसरे राज्य में भी यह व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसे ही अगर एक राज्य में यह लग रहा है कि विधान परिषद की आवश्यकता नहीं है और इससे सरकार के ऊपर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है तो दूसरे राज्य में भी इस तर्क से विधान परिषद को समाप्त करना चाहिए। इसमें निश्चित रूप से एकरूपता लाने की आवश्यकता है। यह नहीं होना चाहिए किसी राज्य में ऐतिहासिक रूप से विधान परिषद नहीं है तो आगे भी नहीं होगा और किसी राज्य में ऐतिहासिक रूप से विधान परिषद है तो वहां हमेशा बना रहेगा।
अब सवाल जिन छह राज्यों में विधान परिषद है वहां के चुनावों को लेकर है। संविधान के मुताबिक विधान परिषद में पांच तरह से सदस्य चुने जाते हैं। इनमें कुछ सदस्यों का मनोनयन राज्य सरकार की सिफारिश पर राज्यपाल करते हैं। कुछ सदस्यों का चुनाव विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं। इसके बाद कुछ सदस्य राज्य के स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के वोट से चुने जाते हैं, कुछ स्नात्तक मतदाताओं के वोट से और कुछ शिक्षक मतदाताओं के वोट से चुने जाते हैं। विधायकों के वोट से होने वाले चुनाव को छोड़ दें तो मनोनयन और बाकी तीन तरह के चुनावों में न तो संविधान की भावना का ख्याल रखा जाता है और न लोकतंत्र की नैतिकता और मर्यादा का कोई ख्याल रखा जाता है। संविधान के मुताबिक राज्यपाल कला, संस्कृति, साहित्य, समाजसेवा आदि क्षेत्र में बहुत अच्छा काम करने वालों को मनोनीत करेंगे। लेकिन वास्तव में पार्टियों के हारे हुए या चुनाव नहीं लड़ने वाले नेताओं को मनोनीत किया जाता है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं को ही समाजसेवी मान लिया जाता है। कई राज्यों में तो अपवाद के लिए भी किसी कलाकार, साहित्यकार या संस्कृतिकर्मी को नहीं मनोनीत किया जाता है।
इसके अलावा स्थानीय निकायों, स्नात्तक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधियों का चुनाव व्यापक रूप से फर्जीवाड़े और पैसे का खेल हो गया है। पहले स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों के वोट से होने वाले चुनाव की बात करें तो इन निर्वाचन क्षेत्रों से लड़ने वाले उम्मीदवार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वोट खरीदते हैं। पहले से चुनाव की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवार अपने क्षेत्र में स्थानीय निकायों के चुनाव में कुछ निश्चित लोगों की मदद करते हैं। यह मदद जाति के नाम से होती है और पैसे के जरिए भी होती है।
उनमें से जीतने वाले उम्मीदवार का सर्टिफिकेट पहले ही संभावित एमएलसी प्रत्याशी के पास जमा हो जाता है। इस तरह उसके पास एक कैप्टिव वोट होता है। ऐसे वोट एक निश्चित मात्रा में सभी प्रत्याशियों के पास होते हैं। इसके बाद चुनाव के समय बचे हुए वोट के लिए हर प्रत्याशी बोली लगाता है। जिसकी बोली ज्यादा होती है या जिसकी जाति के स्थानीय निकाय प्रतिऩिधि ज्यादा होते हैं वह ज्यादा वोट हासिल करता है और जीतता है। इसके कुछ अपवाद भी होते होंगे लेकिन आमतौर पर यह चुनाव ऐसे ही होता है।
जहां तक शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की बात है तो इसमें स्वाभाविक रूप से सारे शिक्षक मतदाता नहीं होते हैं। इसमें मतदाता बनना पड़ता है। चुनाव आयोग मतदाता बनाने की प्रक्रिया शुरू करता है तो चुनाव लड़ने की तैयारी करने वाले लोग मतदाता बनाते हैं। इसमें घनघोर फर्जीवाड़ा होता है। बिहार के सबसे प्रतिष्ठित पटना साइंस कॉलेज का फर्जीवाड़ा इस बार के चुनाव में खुला। वहां की प्रिंसिपल ने चुनाव आयोग को सूचित किया कि पटना साइंस कॉलेज के शिक्षक होने के नाम पर अनेक लोगों को मतदाता बनाया गया है, जबकि वे वहां शिक्षक नहीं हैं। ऐसे ही उन्होंने कहा कि अनेक वास्तविक शिक्षकों का नाम मतदाता सूची में नहीं है। ऐसे ही एक शिक्षण संस्थान से 49 लोगों को मतदाता बनाया गया था। लेकिन जांच में पता चला कि वह संस्थान बंद है। वहां न तो कोई छात्र है और न कोई शिक्षक। इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में फर्जी मतदाता बनाए गए। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में शिक्षक मतदाताओं की संख्या सीमित होती है। तभी गंभीरता से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार पहले से ही कुछ फर्जी मतदाता बनाते हैं और कुछ को पैसे देकर खरीदा जाता है। यह भी दिलचस्प बात है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले का शिक्षक होना जरूरी नहीं है। इसलिए तमाम किस्म के शिक्षा माफिया और भूमाफिया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लड़ते हैं।
स्नात्तक निर्वाचन क्षेत्र का किस्सा और भी दिलचस्प है। आमतौर पर एक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जितने मतदाता होते हैं उनकी संख्या उस क्षेत्र के विधानसभा चुनाव के मतदाताओं की संख्या के पांच फीसदी से भी कम होती है। मिसाल के तौर पर बिहार की पटना स्नातक सीट ले सकते हैं। तीन जिलों में फैली इस सीट में विधानसभा की 26 सीटें हैं और कुल मतदाताओं की संख्या 80 लाख के करीब है। लेकिन पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में सिर्फ 80 हजार मतदाता हैं। सवाल है कि क्या पटना, नालंदा और नवादा जिले के 80 लाख मतदाताओं में से सिर्फ 80 हजार यानी एक फीसदी लोग ही ग्रेजुएट हैं? असल में ये वो लोग हैं, जिनको संभावित उम्मीदवारों ने मतदाता बनाया है। इसका अर्थ है कि हर उम्मीदवार अपने बनाए मतदाताओं के आधार पर चुनाव लड़ता है। क्या इस तरह से चुनाव लोकतंत्र और चुनाव की पूरी प्रक्रिया का मजाक नहीं है? अगर विधान परिषद की व्यवस्था बनाए रखनी है तो उसमें एकरूपता लानी चाहिए और चुनाव की प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव करना चाहिए।
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