यह लाख टके का सवाल है कि सरकार का विरोध कर रहे और खास तौर से ‘रिजीम चेंज’ की बात कर रहे लोगों के पास क्या वैकल्पिक विचार है? ध्यान रहे ‘रिजीम चेंज’ अब किसी फ्रींज एलीमेंट की कही गई बात भर नहीं है। प्रशांत भूषण ने जब यह बात कही थी तब यह माना गया था कि वे भाजपा विरोधी सिविल सोसायटी का प्रतिनिधि चेहरा हैं लेकिन वे मुख्यधारा की राजनीति से नहीं जुड़े हैं इसलिए उनकी बात को विपक्ष का आइडिया नहीं मानना चाहिए। लेकिन अब धीरे धीरे विपक्ष की पार्टियां इसको अपना आइडिया बना रही हैं। मुंबई के शिवाजी पार्क में अपनी शिव सेना की सालाना रैली में उद्धव ठाकरे ने बहुत जोर देकर कहा कि ‘हां, रिजीम चेंज करना ही उद्देश्य है’। इसी तरह उतने ही जोरदार अंदाज में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि ‘कोई लाग लपेट नहीं है, रिजीम चेंज करना है’। कांग्रेस ने जरूर इस तरह की बात नहीं कही है लेकिन मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अब खुल कर ‘रिजीम चेंज’ की बात कर रही हैं।
इसलिए यह सवाल है कि उनके पास क्या वैकल्पिक विचार हैं? जिन मुद्दों को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं उन मुद्दों पर ही क्या उन्होंने अपना वैकल्पिक मॉडल पेश किया है? क्या उन्होंने बताया है कि अगर ‘रिजीम चेंज’ करने में कामयाबी मिल जाती है और उनका ‘रिजीम’ आ जाता है तो वे इन मुद्दों पर क्या करेंगे? हालांकि हर बार यह जरूरी नहीं होता है कि सत्ता का विरोध करने वाली पार्टियां या संगठन अपना वैकल्पिक मॉडल पेश करें। भारत में तो खासतौर से ऐसा नहीं होता है। जनता जब सरकारों का विरोध करती है तो यह नहीं देखती है कि अगर इनको हटा दिया तो कौन आएगा। यह एक गलत धारणा है कि कोई अच्छा विकल्प नहीं है इसलिए लोग नरेंद्र मोदी को चुन रहे हैं। अच्छा विकल्प तो अटल बिहारी वाजपेयी के मुकाबले भी नहीं था लेकिन लोगों ने उनको हरा दिया था। नरसिंह राव के मुकाबले भी अच्छा विकल्प नहीं था और इमरजेंसी के समय हुए चुनाव में इंदिरा गांधी के मुकाबले तो कोई विकल्प ही नहीं था। फिर भी लोगों ने कांग्रेस और इंदिरा गांधी दोनों को हराया। राजीव गांधी को भी वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल ने हराया तो ऐसा नहीं था कि वीपी सिंह ने शासन और राजकाज का कोई वैकल्पिक मॉडल पेश किया था। नरेंद्र मोदी भी 2014 में जीते तो एक बहुत अस्पष्ट सा गुजरात मॉडल पेश किया गया था। लेकिन जिन मसलों पर जनता नाराज थी, हर उस मसले पर कोई वैकल्पिक विचार या मॉडल नहीं पेश किया गया था।
कहने का मतलब है कि चुनाव लोकप्रिय धारणा, आम मतदाता के गुस्से और लोक लुभावन नारों पर जीता जाता है। इसलिए कह सकते हैं कि अभी सिर्फ ‘रिजीम चेंज’ की बात हो और किसी वैकल्पिक मॉडल की बात नहीं करनी चाहिए। इसके बावजूद वैकल्पिक मॉडल की जरुरत बताई जा रही है तो उसका कारण यह है कि पहले के मुकाबले समय बहुत बदल गया है। जिस ‘जेन जी’ की नाराजगी को दिशा देकर विपक्ष चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहा है वह अपने भविष्य को लेकर निराश है तो उसे अपने साथ लाने के लिए आशा की किरण दिखानी होगी। उसे बताना होगा कि अगर वह अपनी नाराजगी और निराशा को वोट के जरिए प्रकट करता है तो उसके बदले में क्या मिलेगा। अगर देश का युवा और छात्र पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी से परेशान हैं तो विपक्ष की सरकार आने पर इन मामलों में क्या किया जाएगा यह युवाओं व छात्रों को बताना होगा। विपक्ष के पास उन गड़बड़ियों को दूर करने का क्या उपाय है और वह अभी की सरकार द्वारा किए जा रहे उपायों से कैसे भिन्न है, यह भी बताना होगा। मौजूदा सरकार ने नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है, जिसकी संभावित सिफारिशों के बारे में खबरें आने लगी हैं। विपक्ष के उपाय क्या उससे भिन्न होंगे?
इसी तरह अगर इस समय देश गहरे आर्थिक संकट में फंसा दिख रहा है, जिसके वैश्विक और घरेलू दोनों कारण हैं तो उस संकट से निकालने का विपक्ष के पास क्या फॉर्मूला है? कैसे भारत में निवेश बढ़ेगा, विदेशी निवेशकों का शेयर बाजार से पैसा निकालना कैसे रूकेगा, रुपए की गिरावट कैसे थमेगी, रोजगार कैसे बढ़ेगा, लोगों की आय कैसे बढ़ेगी, क्या इसका कोई प्लान विपक्ष के पास है? विपक्ष के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए कानून का विरोध कर रहे हैं। सवाल है कि अगर विपक्ष की सरकार आ गई तो वह कैसे नियुक्ति करेगी? पहले जैसे सीधे सरकार नियुक्ति करती थी वह मॉडल लौटेगा या तीन लोगों के नियुक्ति पैनल में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को शामिल किया जाएगा? यह भी बताना चाहिए। ऐसे ही मतदाता सूची में से अगर मृत या स्थायी रूप से शिफ्टेड या डुप्लीकेट वोटर्स के नाम हटाने हैं तो विपक्ष उसका क्या तरीका अपनाएगा? ऐसे अनेक सवाल है, जिन पर विपक्ष को अपना वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करना चाहिए।
यह सही है कि भारत में ऐसा नहीं होता है और किसी नेता के बारे में बनी लोकप्रिय धारणा के आधार पर ही लोग उसको वोट करते हैं। लेकिन पश्चिम के अनेक सभ्य और लोकतांत्रिक देशों में विपक्ष अपना विजन जनता के सामने रखता है। जनता सत्तापक्ष और विपक्ष के विजन का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद वोट करने का फैसला करती है। भारत में विपक्ष को इस तरह का कोई काम करना चाहिए। ध्यान रहे विजन सिर्फ विचारधारात्मक नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी विचारधारात्मक अंतर तो बता रहे हैं। वे अपने आइडिया ऑफ इंडिया को भाजपा, आरएसएस व नरेंद्र मोदी के आइडिया ऑफ इंडिया से बेहतर बता रहे हैं। लेकिन इससे आगे आम आदमी के जीवन से जुड़ी बुनियादी बातों पर भी अपना विजन बताना होगा। अगर विपक्ष ऐसा नहीं करता है तो माना जाएगा कि वह अपने लिए सकारात्मक वोट की बजाय सरकार के खिलाफ नकारात्मक वोट के भरोसे चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है।
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