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जुमलों का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में एक नया जुमला बोला। उन्होंने एआईओ ‘मानव’ की बात कही। पहले भी नरेंद्र मोदी की सरकार यही काम करती रही है। ऐसा लगता है कि सरकार की पूरी टीम इसी काम में लगी रहती है कि कैसे हिंदी, अंग्रेजी और जरुरत हो तो उर्दू के शब्दों के पहले अक्षर लेकर एक शब्द बनाया जाए। कुछ दिन पहले ही विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण यानी वीबी जी राम जी कानून बना। सोचें, कितनी मेहनत लगी होगी इस कानून को जी राम जी नाम देने में। इसमें हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के शब्द एक साथ शामिल किए गए।

उसी तर्ज पर ‘मानव’ का जुमला प्रधानमंत्री ने बोला है। यह एक हिंदी शब्द है, जिसके अंग्रेजी अक्षरों एमएएनएवी से बना कर कुछ मैसेज देने की कोशिश की गई। इसमें एम फॉर मोरल यानी नैतिक, ए फॉर अकाउंटेबिलिटी यानी जवाबदेही, एन फॉर नेशनल सॉवरेनिटी यानी राष्ट्रीय संप्रुभता, ए फॉर एक्सेसिबल यानी सुगम और वी फॉर वैलिड यानी वैध। ऐसा लगता है कि पहले तय किया गया कि एआई का मानव बनाना है और फिर मानव की अंग्रेजी स्पेलिंग के अक्षरों के आधार पर कुछ शब्दों का चयन करके इसे ऐसे प्रस्तुत किया गया, जैसे कोई बड़ी दार्शनिक बात हो। ध्यान रहे अमेरिका के जिन टेक दिग्गजों ने 10 साल पहले एआई की कल्पना की थी और उसे मूर्त रूप दिया तो उनको कभी इस तरह के जुमले गढ़ने की जरुरत नहीं पड़ी। उन्होंने अपने विचार को धरातल पर उतारा। लेकिन भारत के पास एआई के क्षेत्र में देने के लिए नया कुछ नहीं है तो ‘मानव’ का जुमला दे डाला।

इस सम्मेलन में हिस्सा लेने आए गूगल के सुंदर पिचाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और मुलाकात से बाहर निकले तो मीडिया के सामने कहा कि उनकी कंपनी भारत के दो करोड़ कर्मचारियों को एआई का प्रशिक्षण देगी। यह काम दशकों से हो रहा है। अमेरिका और यूरोप के देश तकनीक बनाते हैं और उसे भारत में बेचने से पहले भारत को लोगों को उसका प्रशिक्षण देते हैं। ताकि वे उसके उपयोक्ता बन सकें। य़ही काम कंप्यूटर और ऑपरेटिंग सिस्टम के मामले में 40 साल पहले हो रहा था और अब एआई के मामले में हो रहा है। ले

किन यहां भी प्रधानमंत्री की टीम जुमला उछालने से बाज नहीं आई। गूगल के पेशेवर भारत सरकार के कर्मचारियों को प्रशिक्षण देंगे और उस परियोजना का नाम ‘कर्मयोगी’ होगा। सोचें, भारत के सरकारी कर्मचारी कब से ‘कर्मयोगी’ होने लगे! ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों से आम नागरिकों की शिकायत यह रहती है कि वे कामचोर होते हैं और रिश्वत लेते हैं। तो क्या अब एआई से कैसे कामचोरी करें और कैसे रिश्वत लें इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी? यह भी सवाल है कि जब भारत विश्वगुरू है तो अमेरिका की कंपनी के लोग भारत के कर्मचारियों को क्यों ट्रेनिंग देंगे? कायदे से तो मोदीजी को भारत से लोगों को भेजना चाहिए था, जो अमेरिका और यूरोप के लोगों को ट्रेनिंग देंगे। दुनिया हमको सिखाएगी एआई चलाना और जबकि हम अपने को विश्वगुरू कहते हैं!

संसद के बजट सत्र में एक दिन राज्यसभा की कार्यवाही में कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने इस मामले में अच्छा कहा। राजीव शुक्ला ने कहा कि गुरू होने के लिए शिष्य की जरुरत होती है। लेकिन भारत के पास शिष्य कहां हैं? उन्होंने याद दिलाया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के साथ कई देश खड़े रहे लेकिन भारत के साथ एक भी देश खड़ा नहीं हुआ। यह कैसा विश्वगुरू देश है, जिसके साथ जरुरत पड़ने पर कोई देश खड़ा नहीं हो?

बहरहाल, जी राम जी, मानव, कर्मयोगी जैसे जुमलों की भारत में कमी नहीं है। प्रधानमंत्री ने अपने कार्यालय को तीर्थ बना लिया। अब पीएमओ का नाम सेवा तीर्थ है और वहां लिखा हुआ है, नागरिक देवो भव। यह मामूली बात है कि पांच किलो अनाज और पांच सौ रुपए का मासिक अनुदान पाने वाले नागरिक भी मोदीजी के भारत में देव का दर्जा रखते हैं।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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